MBBS की आवंटित सीट निरस्त करने पर हाईकोर्ट सख्त, छात्र के लिए सीट खाली रखने का आदेश
जबलपुर। एमबीबीएस में प्रवेश के लिए काउंसलिंग और दाखिले की सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बावजूद एक छात्र की आवंटित सीट निरस्त किए जाने का मामला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट पहुंच गया है। मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की युगलपीठ ने छात्र को राहत देते हुए उसके लिए एक एमबीबीएस सीट खाली रखने के निर्देश दिए हैं। साथ ही संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने यह अंतरिम आदेश बड़वानी निवासी दिव्यांशु सेपटा की याचिका पर सुनवाई के बाद दिया।
‘नीट’ में रैंक के आधार पर कॉलेज में मिली थी सीट
याचिका में बताया गया कि दिव्यांशु सेपटा ने एमबीबीएस में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) दी थी। परीक्षा में प्राप्त रैंक के आधार पर उसे काउंसलिंग के जरिए भोपाल के आरकेडीएफ कॉलेज में सीट आवंटित हुई थी। इसके बाद उसने मॉप-अप राउंड में सीट अपग्रेड करने के लिए आवेदन किया।
काउंसलिंग के दौरान निर्धारित औपचारिकताएं पूरी करने के लिए छात्र स्वयं उपस्थित हुआ था। उसने नोडल अधिकारी के सामने अपने शैक्षणिक और अन्य जरूरी दस्तावेजों का सत्यापन भी कराया। सीट आवंटित होने के बाद निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार सीट छोड़ने संबंधी बांड भरा और कॉलेज की तय फीस भी जमा कर दी।
पोर्टल पर रसीद जनरेट नहीं होने का दिया हवाला
याचिकाकर्ता के अनुसार, प्रवेश से जुड़ी सभी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद उसे ई-मेल के माध्यम से जानकारी दी गई कि उसका आवंटित प्रवेश निरस्त कर दिया गया है। इसके पीछे कारण बताया गया कि कॉलेज प्रबंधन की ओर से प्रवेश की रसीद पोर्टल पर जनरेट नहीं की गई थी। छात्र ने इसी कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उसका कहना है कि पोर्टल पर रसीद तैयार नहीं होने की जिम्मेदारी कॉलेज प्रबंधन की थी, जबकि प्रवेश की अन्य सभी जरूरी औपचारिकताएं वह स्वयं पूरी कर चुका था।
चिकित्सा शिक्षा विभाग ने भी कॉलेज को लिखा था पत्र
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संधी ने पैरवी करते हुए युगलपीठ को बताया कि चिकित्सा शिक्षा विभाग के संचालक ने भी इस मामले में कॉलेज प्रबंधन को पत्र लिखा था। पत्र में स्पष्ट किया गया था कि छात्र की प्रवेश रसीद पोर्टल पर जनरेट करने की जिम्मेदारी कॉलेज की है। अधिवक्ता ने दलील दी कि पोर्टल पर रसीद जनरेट करना महज एक प्रशासनिक औपचारिकता है। छात्र की भौतिक उपस्थिति, फीस जमा करने और नोडल अधिकारी से दस्तावेजों का सत्यापन होने के बाद प्रवेश की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। ऐसे में कॉलेज की ओर से हुई चूक के लिए छात्र का प्रवेश निरस्त करना उचित नहीं है।
30 अक्टूबर रिक्त सीटों के लिए आवेदन की अंतिम तिथि
याचिका में यह भी बताया गया कि प्रदेश में एमबीबीएस की वर्तमान में 4 सीटें खाली हैं। इन रिक्त सीटों के लिए आवेदन करने की अंतिम तिथि 30 अक्टूबर निर्धारित की गई है। ऐसे में यदि छात्र को समय रहते राहत नहीं मिली तो उसका मेडिकल प्रवेश प्रभावित हो सकता है।
मामले के सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट की युगलपीठ ने दिव्यांशु सेपटा के लिए एक एमबीबीएस सीट खाली रखने का आदेश दिया है। इसके साथ ही अनावेदकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है। अब मामले में संबंधित पक्षों के जवाब के बाद आगे की सुनवाई होगी।

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