6 साल जेल में रहने के बाद बरी व्यक्ति को ₹6 लाख मुआवजा, UP पुलिस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

6 साल जेल में रहने के बाद बरी व्यक्ति को ₹6 लाख मुआवजा, UP पुलिस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

नई दिल्ली। अपहरण और हत्या के मामले में करीब 6 साल तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहे और बाद में बरी हुए व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट ने ₹6 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है। उत्तर प्रदेश सरकार को 1 महीने के भीतर भुगतान करना होगा। देरी होने पर 18% सालाना ब्याज भी देना पड़ेगा। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने पुलिस की जांच और अभियोजन की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताते हुए इसे ‘न्याय का मजाक’ बताया। कोर्ट ने कहा कि संदेह और अटकलों पर आधारित कहानी के कारण एक व्यक्ति के जीवन के 6 साल जेल में गुजर गए, जबकि मामले में बुनियादी जांच तक ठीक से नहीं की गई।
पीठ ने स्पष्ट किया कि पुलिस और अभियोजन का उद्देश्य किसी भी कीमत पर आरोपी को दोषी ठहराना नहीं होना चाहिए। जब तक अपराध साबित न हो, आरोपी निर्दोष माना जाता है। जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी पीड़ित और शिकायतकर्ता के साथ आरोपी के लिए भी न्याय सुनिश्चित करना है। अन्याय के स्पष्ट मामलों में मुआवजा देना जरूरी हो जाता है।

एफआईआर में आरोपी का नाम नहीं
यह मामला अक्टूबर 2019 में आगरा जिले में दर्ज अपहरण, हत्या और सबूत मिटाने की प्राथमिकी से जुड़ा है। इसमें भारतीय दंड संहिता की धाराओं 364, 302 और 201 के तहत अपराध दर्ज किए गए थे। याचिकाकर्ता 14 नवंबर 2019 से जेल में था। उसका नाम न तो प्राथमिकी में था और न ही दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत दर्ज शिकायतकर्ता के शुरुआती बयान में। बाद में पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज और सह-आरोपी के कथित कबूलनामे के आधार पर उसे आरोपी बनाया।
सुनवाई के दौरान सह-आरोपी की मौत हो गई, जबकि एक अन्य आरोपी, जो याचिकाकर्ता की मां थी, फरार रही। इस मामले में याचिकाकर्ता ही एकमात्र आरोपी था, जिसके खिलाफ मुकदमा चला। मार्च 2026 में जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने लंबी हिरासत और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामले को देखते हुए निचली अदालत को 3 महीने में सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया था। मुकदमा पूरा होने के बाद व्यक्ति बरी हो गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत का फैसला मंगवाकर जांच और अभियोजन की प्रक्रिया की समीक्षा की।

सीसीटीवी फुटेज और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आरोपी को अपराध से जोड़ने के लिए इस्तेमाल की गई सीसीटीवी फुटेज स्पष्ट नहीं थी। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B के तहत जरूरी प्रमाणपत्र भी पेश नहीं किया गया था। कोर्ट ने कहा कि उपनिरीक्षक ने अपनी गवाही में यह स्पष्ट नहीं किया कि शिकायतकर्ता ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपियों की पहचान की थी या उन लोगों को पहचाना था, जो कथित तौर पर उसी दिन उसके पास आए थे। इससे अभियोजन के दावों पर सवाल खड़े हुए।

फिरौती की शिकायत भी दर्ज नहीं थी
अभियोजन ने याचिकाकर्ता पर फिरौती मांगने का आरोप लगाया था, लेकिन इस संबंध में पुलिस में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि 3 व्यक्तियों की पहचान आरोपियों के रूप में कैसे हुई और उन्हें किस आधार पर गिरफ्तार किया गया, जबकि किरावली तहसील की सीसीटीवी फुटेज को अदालत में साक्ष्य के रूप में प्रमाणित नहीं किया गया था। इन खामियों पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने माना कि जांच और अभियोजन की लापरवाही के कारण व्यक्ति को वर्षों तक जेल में रहना पड़ा।

डीजीपी और गृह सचिव को भेजा जाएगा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को 1 महीने में ₹6 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया है। समय पर भुगतान नहीं होने पर 18% सालाना ब्याज देना होगा। फैसले की प्रति उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और गृह सचिव को भी भेजी जाएगी, ताकि पुलिस अधिकारियों को जांच की सही प्रक्रिया का प्रशिक्षण देने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा सकें। कोर्ट की टिप्पणी स्पष्ट करती है कि पुलिस की जिम्मेदारी केवल अपराधियों को पकड़ना नहीं, बल्कि निर्दोष लोगों को गलत तरीके से फंसने से बचाना भी है। कमजोर साक्ष्यों और लापरवाही भरी जांच के कारण किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छिनना न्याय व्यवस्था की गंभीर विफलता है।

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