पोते को भी मिल सकती है अनुकंपा नियुक्ति, सुप्रीम कोर्ट में रेलवे की याचिका खारिज

पोते को भी मिल सकती है अनुकंपा नियुक्ति, सुप्रीम कोर्ट में रेलवे की याचिका खारिज

नई दिल्ली। अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदक का मृत कर्मचारी का बेटा या बेटी होना जरूरी नहीं है। अगर विभाग के नियमों में किसी करीबी रिश्तेदार को नियुक्ति के लिए योग्य माना गया है, तो उसके मामले पर नियमों के अनुसार विचार करना होगा। मध्यप्रदेश के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे की याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा है। इससे मृत रेलकर्मी के पोते जितेंद्र वर्मा की अनुकंपा नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है।
मामला पश्चिम मध्य रेलवे के भोपाल मंडल में हेल्पर-2 के पद पर कार्यरत छमा बाई से जुड़ा है। उनके पति मुन्ना की 18 अगस्त 2002 को मृत्यु हो गई थी। इसके करीब चार साल बाद 12 अगस्त 2006 को उनके बेटे की भी मौत हो गई। पिता की मृत्यु के बाद जितेंद्र का पालन-पोषण उनकी दादी छमा बाई ने किया।
छमा बाई की 19 जून 2016 को नौकरी के दौरान मृत्यु हो गई। इसके बाद जितेंद्र ने दादी की नौकरी के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति मांगी। रेलवे के रिकॉर्ड में वर्ष 2007 से उनका नाम कानूनी वारिस और नामिनी के तौर पर दर्ज था। बाद में उन्होंने सिविल कोर्ट से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र भी हासिल कर लिया।



रेलवे ने गोद लेने को लेकर जताई आपत्ति
रेलवे ने उत्तराधिकार प्रमाण पत्र को अनुकंपा नियुक्ति के लिए पर्याप्त नहीं माना। रेलवे का कहना था कि जितेंद्र को छमा बाई का विधिवत गोद लिया हुआ बेटा साबित नहीं किया गया है। साथ ही, मृत कर्मचारी के पोते को अनुकंपा नियुक्ति देने का कोई प्रावधान नहीं है।
जितेंद्र का कहना था कि उनकी दादी ने उन्हें गोद लिया था। रेलवे ने इस दावे को नहीं माना और आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद मामला केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण पहुंचा। अधिकरण ने रेलवे को अपनी नीति के अनुसार जितेंद्र के मामले पर दोबारा विचार करने के निर्देश दिए। रेलवे ने इस आदेश को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी।

सिर्फ पोता होने के आधार पर दावा खारिज नहीं कर सकते
25 फरवरी 2026 को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने रेलवे की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने रेलवे की अनुकंपा नियुक्ति नीति के क्लॉज-3 का हवाला देते हुए कहा कि कुछ परिस्थितियों में मृत कर्मचारी के बेटे, बेटी, विधवा या विधुर के अलावा करीबी रिश्तेदार और गोद लिए बेटे या बेटी के मामले पर भी विचार किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि भले ही जितेंद्र को छमा बाई का कानूनी रूप से गोद लिया बेटा न माना जाए, लेकिन करीबी रिश्तेदार होने के कारण उनके दावे को केवल इसी आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी देखा कि रेलवे के रिकॉर्ड में उनका नाम दर्ज था और उनके पास उत्तराधिकार प्रमाण पत्र भी था। छमा बाई की नौकरी और सेवानिवृत्ति से जुड़े बकाया पर दावा करने वाला परिवार का कोई दूसरा सदस्य भी सामने नहीं आया था।

30 दिन में मामले पर कार्रवाई के निर्देश
हाईकोर्ट ने रेलवे को जितेंद्र के मामले पर विचार करने और अनुकंपा नियुक्ति देने के लिए 30 दिन का समय दिया था। कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का मकसद कर्मचारी की मौत के बाद परिवार के सामने आए आर्थिक संकट में मदद करना है। मामले में हुई देरी को देखते हुए रेलवे पर 10 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे की दलील नहीं मानी
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार और रेलवे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने रेलवे की याचिका खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया। इससे जितेंद्र वर्मा की अनुकंपा नियुक्ति से जुड़ा हाईकोर्ट का फैसला कायम रहा।

हर पोते को नौकरी का अधिकार नहीं
इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि हर पोते को दादा या दादी की मौत के बाद अनुकंपा नियुक्ति मिल जाएगी। इस मामले में जितेंद्र की पारिवारिक स्थिति, दादी द्वारा उनका पालन-पोषण, रेलवे रिकॉर्ड में उनका नाम, उत्तराधिकार प्रमाण पत्र और रेलवे के नियमों में करीबी रिश्तेदार के लिए मौजूद प्रावधान महत्वपूर्ण रहे। इसलिए इस फैसले को इसी मामले की परिस्थितियों और संबंधित विभाग के नियमों के आधार पर समझना होगा।10:32 AM

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