मध्य प्रदेश में ‘यूसीसी’ पर सियासी पारा चढ़ा, लिव-इन और मतांतरित आदिवासियों के प्रावधानों पर कांग्रेस को ऐतराज

मध्य प्रदेश में ‘यूसीसी’ पर सियासी पारा चढ़ा, लिव-इन और मतांतरित आदिवासियों के प्रावधानों पर कांग्रेस को ऐतराज

भोपाल। प्रदेश की राजनीति में समान नागरिक संहिता (यूसीसी यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड) को लेकर हलचल तेज हो गई। आगामी 20 जुलाई से शुरू हो रहे मध्य प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र में राज्य सरकार इस बहुप्रतीक्षित विधेयक को पेश करने की तैयारी में है। हालांकि, इस कानून का मसौदा अभी पूरी तरह फाइनल नहीं हुआ है, लेकिन इसमें शामिल संभावित नियमों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव के आसार साफ दिखने लगे। कांग्रेस ने इसके कई अहम बिंदुओं पर अपनी गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं।
इस कानून को अमलीजामा पहनाने के लिए मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव अब तक दो महत्वपूर्ण बैठकें कर चुके हैं, जिनमें इसके मुख्य एजेंडे को सैद्धांतिक मंजूरी दी जा चुकी। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अगुवाई वाली ड्राफ्टिंग कमेटी इस कानून के प्रारूप को अंतिम रूप देने का काम कर रही है। सरकार का सबसे ज्यादा जोर इस बात पर है कि जिन आदिवासियों ने अपना मूल धर्म बदलकर दूसरा मत अपना लिया है, उन्हें भी इस कानून के दायरे में लाया जाए। सरकार से जुड़े लोगों और राज्य स्तर पर हुए पब्लिक कंसल्टेशन में शामिल पूर्व जजों का तर्क है कि स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करने के बाद आदिवासियों को मिलने वाले पारंपरिक अधिकार भी समाप्त हो जाने चाहिए।

कानून के मूल विचार पर ही कांग्रेस ने सवाल उठाए
कांग्रेस के तीखे सवाल और सामाजिक ताने-बाने की चिंता
दूसरी तरफ कांग्रेस इस प्रस्तावित कानून के मूल विचार पर ही सवाल उठा रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और भोपाल उत्तर के विधायक आरिफ मसूद सहित पार्टी के तमाम बड़े नेताओं का मानना है कि इस वक्त प्रदेश में ऐसे किसी कानून की कोई जरूरत ही नहीं है। विपक्ष का कहना है कि सरकार को अलग-अलग समाजों और जातियों की सदियों पुरानी परंपराओं तथा रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि भारत का संविधान आदिवासियों को अपनी मर्जी से किसी भी धर्म को मानने की आजादी देता है, इसलिए केवल धर्म बदलने की वजह से उन्हें आदिवासी पहचान से वंचित करना पूरी तरह गलत है।

लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर सामाजिक मूल्यों की दुहाई
विधेयक में लिव-इन रिलेशंस को लेकर जो कड़े नियम बनाए जा रहे हैं, कांग्रेस ने उन पर भी उंगली उठाई है। इस कानून के तहत लिव-इन में रहने वाले कपल्स के लिए अनिवार्य रजिस्ट्रेशन (मैंडेटरी रजिस्ट्रेशन), महिलाओं को मेंटेनेंस यानी भरण-पोषण का हक और इस रिश्ते से पैदा होने वाले बच्चों को पूरा लीगल प्रोटेक्शन देने की बात कही गई है। कांग्रेस का आरोप है कि ऐसे रिश्तों को कानूनी जामा पहनाकर सरकार एक तरह से इन्हें बढ़ावा दे रही है, जो भारतीय संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों के बिल्कुल खिलाफ है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी का आरोप है कि राज्य में बेरोजगारी, महंगाई जैसे कई गंभीर मुद्दे हैं, जिनसे जनता का ध्यान भटकाने के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) यूसीसी का कार्ड खेल रही है। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि अगर सरकार सच में पूरे देश के लिए एक कानून बनाना ही चाहती है, तो उसे शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता लाने के लिए कानून बनाना चाहिए, जिसका विपक्ष भी दिल से स्वागत करेगा।

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