गॉडजिला अल नीनो की दस्तक, ‘नासा’ की चेतावनी से बढ़ा सूखे और भीषण गर्मी का संकट

गॉडजिला अल नीनो की दस्तक, ‘नासा’ की चेतावनी से बढ़ा सूखे और भीषण गर्मी का संकट

वाशिंगटन। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के ताजा आंकड़ों ने भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया की चिंता बढ़ा दी है। प्रशांत महासागर में तेजी से करवट बदल रहा मौसम आने वाले दिनों में एक बड़ी चुनौती बनने जा रहा है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि समंदर में पनप रही अल नीनो की स्थिति के कारण दुनिया को सूखे, बाढ़ और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का सामना करना पड़ सकता है। नासा की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (जेपीएल) के विशेषज्ञों का कहना है कि इस समय पश्चिमी प्रशांत महासागर में ठीक वैसे ही हालात आकार ले रहे हैं, जैसे वर्ष 1997 में देखे गए थे।
ज्ञात हो कि वर्ष 1997-98 का अल नीनो इतिहास का सबसे विनाशकारी मौसमी घटनाक्रम माना जाता है, जिसे वैज्ञानिकों ने ‘सुपर अल नीनो’ या ‘गॉडजिला अल नीनो’ का नाम दिया था। जून 2026 में अंतरिक्ष से मिल रहे संकेत इशारा कर रहे हैं कि मौजूदा अल नीनो भी उसी तरह तबाही मचाने की ताकत रखता है। नासा द्वारा जारी उपग्रह (सैटेलाइट) चित्रों और आंकड़ों से साफ हुआ है कि समंदर के भीतर भारी मात्रा में गर्मी जमा हो चुकी है। इतिहास गवाह है कि वर्ष 1997-98 के दौरान दुनिया के कई कोनों में भयंकर बाढ़, महीनों लंबा सूखा, फसलों की बर्बादी और अप्रत्याशित गर्मी दर्ज की गई थी, और वर्तमान हालात भी इसी डरावनी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

समंदर के भीतर उबल रहा गर्म पानी, बढ़ रहा जलस्तर
नासा के सेंटिनल-6 माइकल फ्रेलिक सैटेलाइट से प्राप्त जानकारियों के मुताबिक, भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के एक बहुत बड़े हिस्से में समुद्र का जलस्तर सामान्य सीमा से काफी ऊपर पहुंच चुका है। मौसम विज्ञानियों के अनुसार, जलस्तर का इस तरह बढ़ना इस बात का पक्का सबूत है कि समंदर की सतह के नीचे भारी मात्रा में गर्म पानी इकट्ठा हो चुका है, क्योंकि पानी गर्म होने पर फैलता है। समंदर के सीने में दबी यह अथाह गर्मी पूरी दुनिया के मौसम चक्र को तहस-नहस करने की क्षमता रखती है।

कमजोर पड़ती हवाएं और केल्विन तरंगों का खतरा
वैज्ञानिकों ने समझाया कि समुद्र की गहराइयों में उठने वाली विशाल जल-तरंगें, जिन्हें केल्विन वेव्स कहा जाता है, इस समय गर्मी को एक छोर से दूसरे छोर तक ले जाने का काम कर रही हैं। जब प्रशांत महासागर में बहने वाली व्यापारिक हवाएं मंदी पड़ती हैं, तो इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के पास जमा गर्म पानी पूर्वी दिशा में दक्षिण अमेरिका के तटों की तरफ बहने लगता है। इस प्रक्रिया के कारण समुद्र के नीचे से ऊपर आने वाला ठंडा पानी रुक जाता है और समंदर का तापमान तेजी से छलांग लगाने लगता है। यही अल नीनो का मुख्य लक्षण है। हालांकि पूर्वी प्रशांत महासागर का तापमान अभी पूरी तरह वर्ष 1997 जितना नहीं थमा है, लेकिन लगातार उठ रही नई केल्विन तरंगें उस कमी को पूरा कर रही हैं, जिससे आने वाले महीनों में इसके और खतरनाक होने की आशंका है।

मौसम विभाग की मुहर और मानसून पर मंडराता खतरा
इस मौसमी उथल-पुथल का असर यह होगा कि दुनिया के कुछ हिस्सों में जहां मूसलाधार बारिश और बाढ़ का तांडव दिखेगा, वहीं ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और भारत समेत एशिया के तमाम इलाकों में मानसून कमजोर पड़ेगा और सूखे जैसी नौबत आ जाएगी। इसके चलते भयंकर लू, खेती-किसानी को नुकसान और मौसम से जुड़ी आपदाएं बढ़ सकती हैं। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए अमेरिका की नेशनल ओशनिक एंड एटमॉसफियर एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) ने भी बीते 11 जून को आधिकारिक तौर पर अल नीनो की शुरुआत का ऐलान कर दिया है। यह कदम मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में कई महीनों तक लगातार दर्ज किए गए असामान्य तापमान के बाद उठाया गया है।

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