कस्टडी में मौत का मामला : आरोपी पुलिस अधिकारी की हाईकोर्ट से जमानत, वरिष्ठ पद पर होना अपराध नहीं!
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत में कैदी देवा की मौत के मामले में नामजद आरोपी पुलिस अधिकारी की जमानत मंजूर कर ली है। जस्टिस आलोक अवस्थी की एकलपीठ ने कहा कि घटना के समय किसी अधिकारी का वरिष्ठ/पर्यवेक्षी पद पर होना एक तथ्य जरूर है, लेकिन सिर्फ इसी आधार पर उस पर सीधी आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती। विभाग की प्रशासनिक जिम्मेदारी और व्यक्तिगत अपराध में अंतर समझना जरूरी है।
यह मामला एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 14ए(2) के तहत दाखिल अपील से जुड़ा है। आरोपी अधिकारी ने स्पेशल कोर्ट द्वारा जमानत अर्जी खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी। आरोपी 5 अक्टूबर 2025 से जेल में था। उस पर हत्या, मारपीट और अवैध रूप से बंधक बनाने जैसे गंभीर आरोप दर्ज हैं।
मामले के अनुसार, कैदी देवा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद शिकायत दर्ज कराई गई थी। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की जांच में पुलिस हिरासत के दौरान प्रताड़ना और लापरवाही से मौत की बात सामने आई थी, जिसके बाद आरोपी अधिकारी सहित 7-8 पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज हुआ।
सुप्रीम कोर्ट के ‘हंसुरा बाई बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ मामले में जारी दिशा-निर्देशों के आधार पर जांच सीबीआई को सौंपी गई थी। जांच के बाद सीबीआई ने सह-आरोपी देवराज, जुबेर खान और गजराज सिंह यादव के खिलाफ चार्जशीट पेश की। वहीं फरार चल रहे आरोपी संजीत सिंह मवई और उत्तम सिंह के खिलाफ सप्लीमेंट्री (पूरक) चार्जशीट दाखिल की गई।
सुनवाई के दौरान आरोपी अधिकारी के वकील ने तर्क दिया कि घटना के दिन अधिकारी वीआईपी ड्यूटी पर थे और थाने में मौजूद नहीं थे। दूसरी ओर, सीबीआई ने जमानत का विरोध करते हुए दावा किया कि अधिकारी की संलिप्तता साबित करने के लिए पर्याप्त मौखिक, दस्तावेजी और डिजिटल सबूत मौजूद हैं।
हाईकोर्ट ने केस डायरी और रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि देवा को 13 जुलाई को पकड़ा गया था। उस समय आरोपी अधिकारी शहर से बाहर ड्यूटी पर थे और 14 जुलाई को वापस लौटे। अदालत ने यह भी देखा कि उनकी गैरमौजूदगी में अन्य पुलिसकर्मी मृतक से पूछताछ कर रहे थे और इस दौरान मारपीट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अधिकारी पर घटना में शामिल रहने, शह देने या उसे रोकने में नाकाम रहने का आरोप था।
अदालत ने साफ किया कि सिर्फ वरिष्ठ पद पर होने के आधार पर जांच एजेंसी को मुख्य आरोपों को साबित करने से छूट नहीं मिल जाती।
पीठ ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि आरोपी काफी समय से जेल में बंद है और जांच एजेंसी कोर्ट में चार्जशीट पेश कर चुकी है, इसलिए अब उन्हें आगे हिरासत में रखने का कोई औचित्य नहीं है। हाईकोर्ट ने पाया कि पूरा मामला सीसीटीवी फुटेज, सरकारी रिकॉर्ड, मेडिकल रिपोर्ट और गवाहों के बयानों पर टिका है। जांच पूरी होने और चार्जशीट दाखिल होने जैसे सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अदालत ने आरोपी पुलिस अधिकारी को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।

Leave a Reply