ये हैं महेश काकड़े, जिन्होंने जीता गणित की दुनिया सबसे बड़ा रामानुजन पुरस्कार!
बेंगलुरु। भारतीय गणितज्ञ और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी) के प्रोफेसर महेश काकड़े को ‘अलजेब्रिक नंबर थ्योरी’ में उनके काम के लिए ‘विकासशील देशों के युवा गणितज्ञों के लिए 2026 रामानुजन पुरस्कार’ मिला। उन्होंने अलजेब्रिक नंबर थ्योरी के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए यह उपलब्धि हासिल की। यह गणित की दुनिया में मिलने वाले सबसे बड़े पुरस्कारों में शामिल है। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, काकड़े के इस काम ने जर्मन गणितज्ञ डेविड हिल्बर्ट की 100 साल से भी पुरानी गणित की 12वीं समस्या को हल करने की दिशा में काम को आसान किया है।
महेश काकड़े की रिसर्च का मुख्य क्षेत्र अलजेब्रिक नंबर थ्योरी है। यह गणित की वह शाखा है, जिसमें अलजेब्रा की मदद से संख्याओं और उनसे जुड़े ढांचों का अध्ययन किया जाता है। उनके शोध क्षेत्रों में नंबर थ्योरी और अरिथमेटिक ज्योमेट्री शामिल हैं। काकड़े ने इवासावा थ्योरी में भी महत्वपूर्ण काम किया। यह बताती है कि जटिल गणितीय संरचनाओं में बदलाव के साथ संख्याओं की विशेषताएं कैसे बदलती हैं। उनके काम में नॉन-कम्यूटेटिव इवासावा थ्योरी के महत्वपूर्ण शुरुआती परिणाम शामिल हैं। काकड़े ने ग्रोंस-स्टार्क, भ्रूमर-स्टार्क अंदाजों पर भी काम किया। ये अलजेब्रिक नंबर थ्योरी की कठिन समस्याएं हैं।
पहले भी जीत चुके हैं कई पुरस्कार
महेश काकड़े अगस्त 2019 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में प्रोफेसर बने। उन्हें 2022 में मैथमेटिकल साइंसेज में इंफोसिस पुरस्कार मिला। 2023 में लंदन मैथमेटिकल सोसायटी का वाइटहेड पुरस्कार मिला। 2023 का फ्रंटियर ऑफ साइंस अवॉर्ड उन्होंने दासगुप्त और केविन वेटुलो के साथ साझा किया। 2024 में उन्हें विज्ञान युवा शांति स्वरूप भटनागर अवार्ड भी मिला है।
ऐसे मिलता है रामानुजन अवार्ड
यह पुरस्कार संयुक्त रूप से इंटरनेशनल सेंटर फॉर थियोरेटिकल फिजिक्स (आईसीटीपी) और इंटरनेशनल मैथमेटिक्स यूनियन (आईएमयू) द्वारा दिया जाता है। यह 45 साल से कम उम्र के उन शोधकर्ताओं को सम्मानित करता है जिन्होंने किसी विकासशील देश में काम करते हुए गणित के क्षेत्र में बेहतरीन शोध किया हो। इस पुरस्कार के साथ 10 हजार डॉलर की नकद राशि भी दी जाती है। महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के नाम पर रखा गया रामानुजन पुरस्कार 2005 से हर साल दिया जा रहा है। यह पुरस्कार विकासशील देशों के उन युवा गणितज्ञों के लिए है जिन्होंने किसी विकासशील देश में काम करते हुए बेहतरीन शोध किया हो। चयन समिति न केवल शोध की गुणवत्ता पर विचार करती है।
बेंगलुरु से कैम्ब्रिज और वापस आईआईएससी
महेश काकड़े का जन्म 1983 में महाराष्ट्र के अकोला में हुआ था। काकड़े का एकेडमिक सफर उन्हें भारत से दुनिया के कुछ प्रमुख गणित संस्थानों और आखिरकार वापस बेंगलुरु ले आया। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी जाने से पहले उन्होंने बेंगलुरु में इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट से गणित में अपनी बैचलर डिग्री पूरी की। उन्होंने 2008 में वहां प्योर मैथमेटिक्स में अपनी डॉक्टरेट की डिग्री पूरी की। अपनी पीएचडी के बाद, उन्होंने प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में गणित के इंस्ट्रक्टर के तौर पर काम किया। इसके बाद अगस्त 2019 में IISc में प्रोफेसर के तौर पर शामिल होने से पहले उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन और किंग्स कॉलेज लंदन में कुछ समय बिताया।

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