ज्ञानेश कुमार पर गुलाम नबी आजाद का सवाल, ‘दो चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए!’

अनंतनाग। डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी के अध्यक्ष गुलाम नबी आजाद ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहे विवाद पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक दल सवाल उठाते रहे हैं और आरोप भी लगते रहे हैं, लेकिन उन्हें साबित करने के लिए ठोस प्रमाण सामने नहीं आ पाए थे। आजाद के मुताबिक, मौजूदा विवाद इसलिए अलग है क्योंकि चुनाव आयोग के ही 2 सदस्यों ने कई मौकों पर मुख्य चुनाव आयुक्त के सामने अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं।
आजाद ने कहा कि चुनाव आयोग के 2 चुनाव आयुक्तों ने 1 दर्जन से अधिक बार कुछ फैसलों और आदेशों को लेकर सवाल उठाए तथा यह जानने की कोशिश की कि कहीं प्रक्रिया में कुछ गलत तो नहीं हो रहा। उनका कहना है कि दोनों आयुक्तों ने अपनी चिंताओं से मुख्य चुनाव आयुक्त को अवगत कराया, लेकिन उनकी आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया गया और फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त की इच्छा के अनुसार लिए गए।

क्या ऐसे चुनावों को वैध माना जाए
उन्होंने कहा कि अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए, उनके नाम हटने के बाद हुए चुनावों को किस तरह देखा जाए। आजाद ने पूछा कि यदि मतदाता सूची में बदलाव को लेकर ही गंभीर सवाल उठ रहे हैं तो क्या ऐसे चुनावों को वैध माना जाना चाहिए या फिर दोबारा चुनाव कराया जाना चाहिए।

बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
गुलाम नबी आजाद ने विपक्ष की ओर से दोबारा चुनाव कराने की मांग को गलत नहीं माना। उन्होंने कहा कि अगर 3 सदस्यीय चुनाव आयोग में से 2 चुनाव आयुक्त किसी फैसले या प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं तो उनकी बात को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और मामले में कार्रवाई होनी चाहिए। आजाद ने विपक्ष से इस मुद्दे पर एकजुट होकर संसद में अपनी बात रखने का भी आह्वान किया।

आजाद का बयान ऐसे समय आया है, जब विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों की खबरें सामने आई हैं। रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीने के दौरान कम से कम 14 मौकों पर कुछ फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज की थीं। इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और फिर नाम बहाल करने, मतदाता संबंधी आदेशों के खिलाफ अपील तथा मतदाता सूची के आंकड़ों तक पहुंच जैसे विषय शामिल बताए गए हैं।

अलग राय सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा
हालांकि, चुनाव आयोग ने इन मतभेदों को लेकर अलग पक्ष रखा है। आयोग का कहना है कि किसी बहु-सदस्यीय संस्था में अलग-अलग राय, सवाल और टिप्पणियां निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा होती हैं। आयोग के अनुसार एसआईआर सहित उसके फैसले पूरे आयोग की सहमति से लिए गए हैं और उसके आदेशों को कानूनी आधार प्राप्त है।
आजाद ने चुनाव आयोग को लेकर उठ रहे सवालों को देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता से भी जोड़ा। उन्होंने 1977 के लोकसभा चुनाव का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनकी पार्टी को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। उनके मुताबिक, ऐसे उदाहरणों के कारण दुनिया में भारत के चुनावों और लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर भरोसा बना था। अब चुनाव आयोग पर लगातार सवाल उठने से उस भरोसे को लेकर चिंता पैदा हो रही है।
चुनाव आयोग को लेकर यह विवाद अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है। एक ओर 2 चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, वहीं आयोग इन मतभेदों को सामान्य संस्थागत विचार-विमर्श का हिस्सा बता रहा है। इसी बीच गुलाम नबी आजाद ने कहा है कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के बाद हुए चुनावों की वैधता और दोबारा चुनाव कराने की मांग पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।09:31 AM

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