नई दिल्ली। भारतीय चुनाव आयोग के शीर्ष अधिकारियों के बीच वैचारिक और प्रशासनिक असहमति को लेकर सामने आई एक मीडिया रिपोर्ट के बाद देश की राजनीति में गहरा भूचाल आ गया है। इस ताजा विवाद के तूल पकड़ने के बाद देश के कई प्रमुख विपक्षी नेताओं ने हाल ही में संपन्न हुए कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों को रद्द कर उन्हें दोबारा कराए जाने की पुरजोर मांग उठाई है।
इन नेताओं ने की दोबारा चुनाव की मांग
हालिया रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद उद्धव ठाकरे, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल जैसे दिग्गज विपक्षी नेताओं ने आक्रामक रुख अपना लिया है। इन सभी नेताओं ने संयुक्त रूप से मांग की है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के अलावा वर्ष 2024 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों को भी पूरी तरह से रद्द किया जाए और उन सभी जगहों पर नए सिरे से दोबारा चुनाव कराए जाएं ताकि निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।
क्या है पूरा मामला और रिपोर्ट का दावा
यह पूरा विवाद अंग्रेजी अखबार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक विशेष जांच रिपोर्ट के बाद सामने आया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी के बीच कामकाज के तरीकों को लेकर गंभीर मतभेद रहे हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इन दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों की अवधि में कम से कम 14 बार आयोग के विभिन्न महत्वपूर्ण फैसलों और औपचारिक आदेशों पर अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी।
जांच रिपोर्ट में बताया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों के बीच यह असहमति मुख्य रूप से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान यानी एसआईआर को लेकर थी। इसके तहत मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने, पुराने नाम हटाने, नामों को बहाल करने, फॉर्म-6 में किए गए बदलावों और मतदाता डेटा के प्रबंधन से जुड़े तमाम मामलों पर सवाल उठाए गए। कुछ मामलों में तो दोनों आयुक्तों ने ऐसे फैसलों पर भी अपनी असहमति जताई, जिनके बारे में उनका यह कहना था कि उन्हें इस संबंध में पहले से कोई आधिकारिक जानकारी ही नहीं दी गई थी।
सॉफ्टवेयर और डेटा केंद्रीकरण पर भी उठे सवाल
अखबार की रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता डेटा तथा चुनावी सॉफ्टवेयर के केंद्रीकरण को लेकर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की थी। इस संवेदनशील मामले को लेकर उन्होंने देश के कैबिनेट सचिव को भी पत्र लिखा था। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम के सामने आने के बाद चुनाव आयोग की तरफ से सफाई भी सामने आई है। आयोग का कहना है कि संस्था के भीतर आधिकारिक स्तर पर लिखित टिप्पणियां आना, तकनीकी सुझाव देना और अलग-अलग राय रखना किसी भी सामान्य और लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रिया का एक स्वाभाविक हिस्सा है।