फ्लैट नहीं मिला, फिर भी किस्तें भरी, खरीददार को राहत की मांग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र सरकार को नोटिस !

फ्लैट नहीं मिला, फिर भी किस्तें भरी, खरीददार को राहत की मांग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र सरकार को नोटिस !

नई दिल्ली। देशभर में ऐसे हजारों होमबायर्स हैं, जिन्होंने अपने सपनों का घर खरीदने के लिए बैंक से लोन लिया, लेकिन वर्षों बाद भी उन्हें फ्लैट का कब्जा नहीं मिला। दूसरी ओर, बैंक की क़िस्त (ईएमआई) लगातार कट रही है। बिल्डर, बैंक और खरीदार के बीच बने इसी विवादास्पद तंत्र को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
मामला एक फ्लैट खरीदार की याचिका से जुड़ा है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि उसने जिस परियोजना में फ्लैट बुक किया था, उसका कब्जा अब तक नहीं मिला, लेकिन बैंक उससे नियमित रूप से ईएमआई वसूल रहा है। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि वित्तीय संस्थान और बैंक ‘सबवेंशन योजना’ की शर्तों का पालन नहीं कर रहे हैं, जबकि इस संबंध में पहले से स्पष्ट समझौते मौजूद हैं।

याचिकाकर्ता को राहत दी गई
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह शामिल हैं, ने मामले की सुनवाई करते हुए होमबायर्स की समस्याओं को गंभीर माना। अदालत ने केंद्र सरकार समेत अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। साथ ही अंतरिम राहत देते हुए निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ फिलहाल किसी प्रकार की दंडात्मक या जबरन कार्रवाई न की जाए।

त्रिपक्षीय मॉडल की खामियां
याचिका में उस व्यवस्था का उल्लेख किया गया है, जिसे रियल एस्टेट क्षेत्र में व्यापक रूप से अपनाया जाता है। इस त्रिपक्षीय ‘बायर-बिल्डर-लेंडर’ मॉडल के तहत खरीदार शुरुआत में केवल 10% से 20% राशि देता है, जबकि शेष धनराशि बैंक ऋण के रूप में सीधे बिल्डर को उपलब्ध कराता है। योजना के अनुसार परियोजना पूरी होने और कब्जा मिलने तक ब्याज अथवा क़िस्त का भुगतान बिल्डर द्वारा किया जाना होता है।

बैंक-बिल्डर की जवाबदेही तय हो
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि यदि सबवेंशन योजना के तहत खरीदा गया फ्लैट तय समय पर नहीं मिलता, तो उसका पूरा वित्तीय बोझ केवल खरीदार पर नहीं डाला जाना चाहिए। याचिका में कहा गया है कि ऐसी स्थिति में बैंक और बिल्डर दोनों की जवाबदेही तय हो तथा उन्हें भी नुकसान की जिम्मेदारी साझा करनी पड़े।

केंद्र सरकार से याचिका में मांग
याचिका में केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई है कि यदि खरीदार को संपत्ति या फ्लैट उपलब्ध नहीं कराया जाता, तो बैंक और बिल्डर दोनों जारी किए गए ऋण की राशि का समान रूप से नुकसान वहन करें। इसके अलावा रुकी हुई आवासीय परियोजनाओं में फंसे खरीदारों के लिए एक व्यवस्थित ऋण-राहत योजना बनाने और निर्माण की वास्तविक प्रगति के आधार पर ही ऋण वितरण सुनिश्चित करने की भी मांग की गई है।

सबवेंशन योजना के नियमों की अनदेखी
याचिकाकर्ता का कहना है कि कई मामलों में बैंक और वित्तीय संस्थान सबवेंशन योजना के मूल नियमों की अनदेखी कर रहे हैं, जिसके कारण खरीदारों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। अदालत ने इन तर्कों पर गौर करते हुए मामले को व्यापक जनहित से जुड़ा माना और सरकार से इस विषय पर विस्तृत पक्ष प्रस्तुत करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट की इस पहल से उन हजारों होमबायर्स को राहत की उम्मीद जगी है, जो वर्षों से घर के इंतजार के साथ-साथ बैंक ऋण का बोझ भी उठा रहे हैं।

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