न्यायिक बयानों पर घमासान, पूर्व सीजेआई गवई और अन्य जजों ने जस्टिस भुइयां पर उठाए गंभीर सवाल!

न्यायिक बयानों पर घमासान, पूर्व सीजेआई गवई और अन्य जजों ने जस्टिस भुइयां पर उठाए गंभीर सवाल!

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां की तरफ से हाल ही में दिए गए एक बयान पर कानूनी जगत में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। पूर्व चीफ जस्टिस बीआर गवई और दिल्ली हाईकोर्ट के दो सेवानिवृत्त न्यायमूर्तियों ने इस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई है। इन सभी का मानना है कि किसी ऐसे विषय पर सार्वजनिक मंच से राय रखना न्यायिक मर्यादा के बिल्कुल विपरीत है, जो मामला इस समय अदालत में विचाराधीन हो।
पूरे विवाद की शुरुआत रविवार को हुई, जब जस्टिस भुइयां ने एक यूनिवर्सिटी के कार्यक्रम में शिरकत करते हुए कहा था कि देश के लाखों नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया अपने मूल रूप में पूरी तरह से मनमानी है। इसके अगले दिन यानी सोमवार को पूर्व सीजेआई गवई ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के किसी भी वर्तमान जज को विचाराधीन मामलों पर इस तरह से सार्वजनिक बयानबाजी करने से बचना चाहिए। यह आचरण न्यायिक गरिमा के अनुकूल नहीं है।

न्यायाधीश की निर्धारित सीमाओं से आगे का बयान
दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस ढींगरा ने भी इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह बयान सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान न्यायाधीश की निर्धारित सीमाओं से बहुत आगे निकल गया है। किसी भी लंबित मामले पर इस प्रकार की सार्वजनिक टिप्पणी करने से पहले कई बार विचार करना चाहिए था। उन्होंने यह भी कहा कि जस्टिस भुइयां के पास शायद इस मामले से जुड़े सभी तथ्य पूरी तरह से उपलब्ध नहीं थे। यदि चुनाव आयोग को इस पर कोई आपत्ति या असहमति थी, तो वे खुद अपनी बात देश के सामने रख सकते थे। आयोग के अधिकारी देश के शीर्ष प्रशासनिक पदों पर हैं और वे अपनी बात कहने के पूरी तरह सक्षम हैं, इसलिए किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उनकी तरफ से बयान दिए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

आरएस सोढ़ी ने भी वोट के अधिकार पर टिप्पणी की
दिल्ली हाईकोर्ट के एक अन्य सेवानिवृत्त न्यायाधीश, जस्टिस आरएस सोढ़ी ने भी वोट के अधिकार पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के पास मतदान का अधिकार होगा या नहीं, यह पूरी तरह से देश के कानूनों पर निर्भर करता है। यदि कोई नागरिक तय कानूनी दायरे में आता है, तो उसका वोट वैध है, और यदि वह कानून के मानदंडों को पूरा नहीं करता, तो उसका अधिकार नहीं बनता है। यदि किसी का नाम मतदाता सूची में किसी तकनीकी गलती से आ गया है या वह कानूनी शर्तों को पूरा नहीं करता, तो सूची से नाम हटाने की एक तय कानूनी प्रक्रिया होती है जिसका पालन किया जाना चाहिए। पात्रता पूरी होने पर नागरिक दोबारा अपना नाम सूची में शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकता है। उनके अनुसार, इस तरह की कठोर सोच और सार्वजनिक बयान देना किसी भी गंभीर विषय को परखने का सही और परिपक्व तरीका नहीं है, खासकर तब जब आप एक ऐसे पद पर हों जिसका आधार पूरी तरह से विवेक और विश्लेषण पर टिका होना चाहिए।

कानून के छात्रों की प्रशंसा की
अपने इस संबोधन के दौरान जस्टिस भुइयां ने कार्यक्रम में मौजूद छात्रों की सराहना भी की थी। उन्होंने कहा था कि वे सार्वजनिक मुद्दों पर मुखर होकर अपनी राय रखने के लिए पहचाने जाते हैं। उन्होंने छात्रों की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने देश और दुनिया के सामने यह साबित कर दिया है कि एक कानून के छात्र को कैसा होना चाहिए। उनकी नजर में युवा छात्र बेहद प्रतिभाशाली, निडर और साहसी हैं।

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