इंदौर लकड़ी मंडी में ‘कबूतर टीपी’ का खेल, राज्यस्तरीय कार्रवाई के बाद बड़े रैकेट के खुलासे पर टिकी नजरें!
इंदौर। बहुचर्चित इंदौर लकड़ी मंडी में ‘कबूतर टीपी’ के खेल को लेकर एक बार फिर प्रशासनिक गलियारों में सरगर्मी तेज हो गई। यह पूरा मामला अवैध रूप से काटी गई लकड़ियों के परिवहन और कागजी हेराफेरी से जुड़ा है। मंडी सूत्रों के अनुसार, इस फर्जीवाड़े में अवैध लकड़ी मध्य प्रदेश की होती थी, लेकिन उसके साथ जो ट्रांजिट परमिट (टीपी) संलग्न किया जाता था, वह तेलंगाना, गुजरात, महाराष्ट्र या मध्य प्रदेश के ही उज्जैन, देवास, बालाघाट और सीहोर जैसे अन्य जिलों का होता था।
कागजों पर किसी अन्य स्थान का विवरण और मौके पर लकड़ी किसी और क्षेत्र की होने के कारण ही इसे ‘कबूतर टीपी’ का नाम दिया गया।
यह कथित अवैध नेटवर्क वन विभाग के नाकों से ही शुरू होता था, जहां से सेवा शुल्क के एवض में संदिग्ध वाहनों को आगे बढ़ा दिया जाता था। कई नाकों को पार करते हुए ये वाहन आसानी से इंदौर लकड़ी मंडी तक पहुंच जाते थे, जिससे विभागीय जांच की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। मंडी में प्रवेश के बाद वन विभाग के नियमित कर्मचारी की अनुपस्थिति में एक निजी व्यक्ति द्वारा वाहनों की एंट्री कराई जाती थी। इसके बाद दलालों द्वारा इन लकड़ियों की नीलामी की जाती थी और वे आरा मशीनों तक पहुंचकर गोल लकड़ियों से गुटके और फाचर बना दिए जाते थे।
शाम के वक्त एक वनरक्षक द्वारा ‘सरेंडर टीपी’ लेने की प्रक्रिया पूरी की जाती थी, जिस पर भी प्रभावी कार्रवाई न होने और सेवा शुल्क के जरिए अधिकारियों तक जानकारी पहुंचने के आरोप लगते रहे हैं। राजवाड़ा दर्पण द्वारा वर्ष 2023 से इस मामले का लगातार खुलासा किए जाने और 2024 में फर्जी टीपी वाले वाहन पकड़े जाने के बावजूद स्थानीय स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई। गत 21 अगस्त 2026 को राज्यस्तरीय उड़नदस्ते द्वारा दो संदिग्ध वाहनों की जब्ती के बाद यह मामला फिर से तूल पकड़ चुका है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भोपाल स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा की जाने वाली जांच इस अंतरराज्यीय रैकेट की तह तक जाएगी, जिसमें टीपी जारी करने वाले स्रोत, मंडी के प्रवेशी, आरा मशीन संचालक और सफेदपोश दलाल शामिल हैं; या फिर यह कार्रवाई हमेशा की तरह केवल छोटे मोहरों और कुछ वन माफियाओं तक ही सिमटकर रह जाएगी।

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