इंदौर में ‘आरईटी’ मॉडल से दुर्लभ वनस्पतियों के संरक्षण की ऐतिहासिक पहल, देश में पहली बार हुआ प्रयोग

इंदौर। देशभर में वर्षों से चल रहे पौधारोपण अभियानों के बीच इंदौर वन मंडल ने संरक्षण की दिशा में एक नया और प्रभावी मॉडल प्रस्तुत किया है। ‘आरईटी’ (Rare, Endangered and Threatened) मॉडल के माध्यम से दुर्लभ और विलुप्तप्राय देशी वृक्ष प्रजातियों के संरक्षण का यह अभिनव प्रयोग देश में पहली बार किया गया है, जिसने इंदौर को वन संरक्षण के क्षेत्र में अग्रणी जिलों की सूची में शामिल कर दिया है।


क्या है ‘आरईटी’ मॉडल और क्यों है यह खास

इंदौर के डीएफओ प्रदीप मिश्रा द्वारा शुरू किया गया ‘आरईटी’ मॉडल उन देशी वृक्ष प्रजातियों पर केंद्रित है, जिनकी संख्या किसी क्षेत्र में एक प्रतिशत से भी कम रह गई है। बीजा, हल्दू, कुल्लू, अर्जुन और अंजन जैसी प्रजातियाँ पारिस्थितिकी संतुलन, भूजल संरक्षण, मिट्टी की पकड़ और जैव विविधता के लिए अत्यंत आवश्यक मानी जाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इन प्रजातियों के समाप्त होने से पूरा पारिस्थितिक तंत्र कमजोर हो सकता है।

40 वर्षों के डेटा विश्लेषण से सामने आई सच्चाई

इंदौर वन मंडल ने पिछले 40 वर्षों के वर्किंग प्लान डेटा का वैज्ञानिक विश्लेषण किया। अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ कि अंधाधुंध दोहन, वैज्ञानिक प्रबंधन की कमी और प्राकृतिक पुनर्जनन की अनदेखी के कारण ‘आरईटी’ श्रेणी की प्रजातियाँ तेजी से घट रही हैं। इसी निष्कर्ष के आधार पर पारंपरिक पौधारोपण से अलग, लक्षित संरक्षण मॉडल तैयार किया गया।

पारंपरिक पौधारोपण से अलग है यह मॉडल

आरईटी’ मॉडल केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं है। इसमें प्रजाति-वार पहचान, गणना, सतत निगरानी और संरक्षण को प्राथमिकता दी गई है। डीएफओ प्रदीप मिश्रा के अनुसार, किसी पौधे की मृत्यु होने पर तुरंत प्रतिस्थापन, स्थानीय जलवायु के अनुकूल देशी प्रजातियों को बढ़ावा और केवल सर्वाइवल नहीं बल्कि प्रजाति-विशेष की निरंतर निगरानी इस मॉडल की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

रेजिडेंसी नर्सरी बनी विशेष ‘आरईटी’ नर्सरी

इंदौर की रेजिडेंसी नर्सरी को देश की पहली शहरी ‘आरईटी’ नर्सरी के रूप में विकसित किया गया है। जहाँ पहले लगभग 2 हजार दुर्लभ प्रजातियों के पौधे तैयार होते थे, वहीं अब इस संख्या को 50 हजार से अधिक तक ले जाने की योजना पर काम किया जा रहा है।

समुदाय को जोड़कर संरक्षण और आजीविका का मॉडल

इस पहल को स्थायी बनाने के लिए संयुक्त वन प्रबंधन समितियों को भी जोड़ा गया है। 40 से अधिक समितियों को ‘आरईटी’ बीज संग्रह और माइक्रो नर्सरी का प्रशिक्षण दिया गया है। इससे एक ओर दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण हो रहा है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण समुदाय को आर्थिक लाभ भी मिल रहा है।

शहरी क्षेत्रों और शिक्षा संस्थानों में प्रभाव

इंदौर के स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों और सरकारी परिसरों में ‘आरईटी’ पौधारोपण किया गया है। होलकर साइंस कॉलेज में 5 हजार पौधों का डेमो प्लांटेशन तैयार किया गया है। इसके सकारात्मक प्रभाव को देखते हुए देवी अहिल्या बाई विश्वविद्यालय ने वन विभाग के सहयोग से ‘आरईटी’ और अन्य वनस्पतियों पर आधारित 15 घंटे का अकादमिक कोर्स शुरू करने पर सैद्धांतिक सहमति दी है, जिसके लिए शीघ्र एमओयू किया जाएगा।

अन्य जिलों में भी बढ़ी रुचि

मध्य प्रदेश पुलिस द्वारा इंदौर और देवास में ‘आरईटी’ पौधारोपण, साथ ही देवास, उज्जैन और धार जिलों की बढ़ती रुचि ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इंदौर का यह मॉडल न केवल सफल है, बल्कि अन्य जिलों में भी दोहराया जा सकता है।

नीति और भविष्य की सोच का उदाहरण

डीएफओ प्रदीप मिश्रा के अनुसार, इंदौर का ‘आरईटी’ मॉडल केवल एक प्रयोग नहीं, बल्कि नीति स्तर पर सोच में बदलाव, संस्थागत प्रतिबद्धता और सामुदायिक सहभागिता का जीवंत उदाहरण है। यह पहल भविष्य में पारिस्थितिकी संरक्षण को मजबूत करने और दुर्लभ वनस्पतियों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

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