घोसी (मऊ)। रूस-यूक्रेन युद्ध में जान गंवाने वाले घोसी कोतवाली क्षेत्र के चंद्रापार गांव निवासी 43 वर्षीय विनोद यादव की निशानी 29 माह बाद शनिवार को उनके पैतृक घर पहुंची। भारतीय दूतावास के माध्यम से भेजी गई कपड़ों और जरूरी दस्तावेजों की पोटली जैसे ही परिजनों के हाथों में पहुंची, पूरा परिवार बिलख उठा। गांव में भी शोक की लहर दौड़ गई और हर ओर मातम का माहौल बन गया।
परिजनों के अनुसार विनोद यादव को दिल्ली के दो एजेंटों ने रूस में आकर्षक वेतन वाली नौकरी का झांसा दिया था। इसी लालच में वह 13 जनवरी 2024 को अपने गांव से रवाना हुए। रूस भेजने से पहले दिल्ली में उनसे रूसी भाषा में तैयार एक एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर भी कराए गए, जिसकी पूरी जानकारी उन्हें नहीं थी।
रूस पहुंचने के बाद विनोद को सीधे रूसी सेना के शिविर में ले जाया गया। वहां सैन्य अधिकारियों की सख्ती और परिस्थितियां देखकर उन्हें यह एहसास हो गया कि उनके साथ धोखा हुआ है, लेकिन तब तक वापस लौटने का कोई रास्ता नहीं बचा था। इसके बाद मार्च-अप्रैल 2024 के दौरान युद्ध क्षेत्र में उनकी मौत हो गई। लंबे प्रयासों के बावजूद उनका शव भारत नहीं लाया जा सका। अब भारतीय दूतावास ने उनकी स्मृति के रूप में कपड़ों और दस्तावेजों की पोटली परिजनों तक पहुंचाई है। दूतावास के अधिकारियों के गांव पहुंचते ही घर का माहौल गमगीन हो गया। पत्नी अनीता देवी विलाप करने लगीं। 18 वर्षीय पुत्र आलोक यादव अपने बड़े चाचा देवेंद्र यादव से लिपटकर रो पड़ा। 10 वर्षीय शिवांगी और 7 वर्षीय शिवानी भी पिता की याद में फफक उठीं। उनकी सहेलियां उन्हें ढांढस बंधाने की कोशिश करती रहीं, लेकिन पूरे परिवार का दुख देखकर वहां मौजूद लोगों की आंखें भी नम हो गईं।
बेटे की राह देखते पिता का निधन
विनोद यादव चार भाइयों में सबसे छोटे थे। बड़े भाई रवींद्र यादव मलेशिया में रहते हैं, जबकि दूसरे भाई योगेंद्र यादव का पहले ही निधन हो चुका है। पिता दुखंती यादव को अप्रैल 2024 में बेटे के युद्ध में मारे जाने की सूचना मिल गई थी। वह लगातार बेटे के अंतिम दर्शन की उम्मीद लगाए बैठे रहे, लेकिन यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी। बेटे का शव आने से पहले ही बीते अप्रैल में उनका भी निधन हो गया।
कई परिवारों पर टूटा युद्ध का कहर
चंद्रापार निवासी विनोद यादव 13 जनवरी 2024 को अपने गांव के मित्र सुनील यादव और आजमगढ़ जिले के बाजार गोसाई निवासी अपने जीजा कन्हैया यादव के साथ रूस गए थे। इसके कुछ दिन बाद 26 जनवरी 2024 को मोहम्मदाबाद क्षेत्र के गौहरपुर निवासी श्याम सुंदर यादव को भी एजेंटों ने रूस भेज दिया।
श्याम सुंदर यादव की 24 मार्च 2024 को युद्ध के दौरान गोलीबारी में मौत हो गई थी। उस समय उनके पिता भजुरामा ने आरोप लगाया था कि विनोद यादव ही उनके बेटे को रूस ले गए थे। हालांकि विनोद स्वयं उस समय रूस में फंसे हुए थे, इसलिए यह आरोप साबित नहीं हो सका। बाद में श्याम सुंदर यादव का शव परिजनों के प्रयासों के बाद भारत लाया गया। इसी क्रम में दिसंबर 2024 में कन्हैया यादव का शव भी भारत पहुंचा, जबकि सुनील यादव का शव लगभग 7 माह पहले स्वदेश लाया गया था। अब विनोद यादव के मामले में केवल उनकी व्यक्तिगत वस्तुएं और दस्तावेज ही परिवार तक पहुंच सके हैं, जो उनके जीवन की अंतिम निशानी बनकर रह गए हैं।