यूरोप में 43 डिग्री पर हाहाकार, जबकि भारत में शांति, क्या है इसके पीछे का असली विज्ञान !

नई दिल्ली। यूरोप के कई देशों में इन दिनों गर्मी ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। फ्रांस, स्पेन, इटली और पुर्तगाल जैसे इलाकों में पारा 40 से 43 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है, जिससे वहां आपातकाल जैसी स्थिति है। इस बीच सोशल मीडिया पर एक दिलचस्प बहस छिड़ गई है कि जब भारत के लोग हर साल 43 से 48 डिग्री तक की भीषण गर्मी आराम से बर्दाश्त कर लेते हैं, तो यूरोप में इतनी चिल्ल-पों क्यों मची है? ऊर्जा और जलवायु नीति विशेषज्ञ सिद्धार्थ सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ‘एक्स’ पर इस सवाल का बहुत ही सटीक और वैज्ञानिक जवाब साझा किया है। उनका कहना है कि थर्मामीटर पर तापमान भले ही एक जैसा दिखे, लेकिन इंसानी शरीर को गर्मी का अहसास कैसा होगा, यह कई अन्य भौगोलिक और ढांचागत कारणों पर निर्भर करता है।

सूरज की किरणों का कोण और लंबे दिन
विशेषज्ञ के मुताबिक, यूरोप की भौगोलिक स्थिति भारत से काफी अलग है। वह काफी ऊंचे उत्तरी अक्षांश पर स्थित है, जैसे पेरिस की स्थिति कनाडा के टोरंटो से भी अधिक उत्तर में है। इस वजह से गर्मी के मौसम में वहां दिन बहुत लंबे होते हैं। सूरज की किरणें एक विशेष कोण से बहुत लंबे समय तक सीधे जमीन पर पड़ती हैं, जिससे वहां की इमारतें और सड़कें पूरे दिन तपती रहती हैं। इसके विपरीत, भारत में धूप लगभग सीधे सिर के ऊपर से पड़ती है, जिससे उसकी अवधि और प्रभाव का तरीका यूरोप से अलग हो जाता है।

साफ आसमान बनाम भारतीय प्रदूषण का अनोखा असर
धूप के तीखेपन के पीछे एक बड़ा कारण वायुमंडल की स्थिति भी है। भारत के अधिकांश शहरों की हवा में धूल और सूक्ष्म कण यानी पार्टिकुलेट मैटर की मात्रा अधिक होती है। ये कण सूर्य की सीधी किरणों को हवा में ही बिखेर देते हैं, जिससे धूप की चुभन थोड़ी घट जाती है। वहीं, यूरोप की हवा बहुत साफ होती है, जिसके कारण सूरज की किरणें बिना किसी रुकावट के सीधे त्वचा पर लगती हैं और बेहद तीखी महसूस होती हैं। हालांकि, विशेषज्ञ ने साफ किया कि प्रदूषण को किसी भी तरह फायदेमंद नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह सेहत के लिए एक गंभीर खतरा है।

थमी हुई हवा और पसीने की बेचैनी
यूरोप में चल रही मौजूदा हीटवेव की एक बड़ी समस्या यह भी है कि वहां हवा बिल्कुल बंद है। जब पारा 43 डिग्री हो और हवा का एक झोंका भी न चले, तो शरीर का पसीना सूख नहीं पाता। ऐसे में घुटन और बेचैनी कई गुना बढ़ जाती है। इंटरनेट यूजर्स ने भी इस पर अपनी राय देते हुए कहा कि गर्मी के अहसास में उमस यानी ह्यूमिडिटी की बहुत बड़ी भूमिका होती है, क्योंकि नमी के कारण पसीना न सूखने से शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाता।

सर्दियों के अनुकूल बने घर, एयर कंडीशनर की कमी
यूरोप के घरों की बनावट इस संकट को और बढ़ा देती है। वहां के मकान पारंपरिक रूप से कड़ाके की ठंड को झेलने के लिए बनाए जाते हैं। मोटी दीवारें, लकड़ी के फर्श, खास इंसुलेशन और भारी छतें सर्दियों में गर्मी को घर के अंदर रोक कर रखती हैं। अब यही खूबी गर्मियों में अभिशाप बन गई है, क्योंकि बाहर की गर्मी घरों के अंदर ही कैद हो जाती है। इसके अलावा, यूरोप में ऐतिहासिक रूप से कभी इतनी गर्मी नहीं पड़ी, इसलिए वहां के पुराने घरों में एयर कंडीशनर लगाने का चलन नहीं रहा। कई शहरों में तो ऐतिहासिक इमारतों के बाहरी रूप को न बदलने के कड़े नियमों के कारण भी लोग एसी नहीं लगा पाते। इसके विपरीत, भारत में लंबे समय से भीषण गर्मी पड़ती रही है, इसलिए यहां के घरों में वेंटिलेशन और हवा आने-जाने का खास ख्याल रखा जाता है, साथ ही कूलर और एसी का इस्तेमाल भी बहुत आम है।

भारत की अपनी चुनौतियां
सिद्धार्थ सिंह ने इस बात पर भी जोर दिया कि भले ही भारत में 43 डिग्री पर यूरोप जैसा हंगामा न दिखे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यहां सब कुछ ठीक है। भारत में भी हर साल लू के कारण लाखों लोग प्रभावित होते हैं और कई जानें जाती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि हमारे यहां इस मौसम को सामान्य मान लिया जाता है और इस पर मानवीय दृष्टिकोण से उतनी चर्चा नहीं होती। आज भी भारत की एक बहुत बड़ी आबादी टीन की छत वाले घरों में रहने को मजबूर है, जिनके पास एयर कंडीशनिंग जैसी बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं।

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