इंदौर की यातायात व्यवस्था बदहाल, पर हेलमेट पहनना अनिवार्य! ट्रैफिक पुलिस हेलमेट न पहनने वाले लोगों के चालान बनाने में लगी

इंदौर की यातायात व्यवस्था बदहाल, पर हेलमेट पहनना अनिवार्य! ट्रैफिक पुलिस हेलमेट न पहनने वाले लोगों के चालान बनाने में लगी

     इंदौर। देश का सबसे स्वच्छ शहर आज एक गंभीर विरोधाभास से जूझ रहा है। एक तरफ शहर विकास की नई ऊंचाइयों को छूने का दावा करता है, वहीं दूसरी तरफ इसकी सड़कों पर रेंगता हुआ ट्रैफिक और धूल-धुएं के गुबार एक अलग ही कहानी बयां करते हैं। वर्तमान में इंदौर की यातायात पुलिस और प्रशासन का पूरा ध्यान केवल ‘हेलमेट’ पर केंद्रित हो गया है, जबकि शहर की बुनियादी समस्याएं जैसे टूटी सड़कें, जलभराव, और अनियंत्रित ट्रैफिक जाम हाशिए पर हैं।
     शहर के लगभग हर प्रमुख चौराहे पर आज यातायात व्यवस्था सुधारने के बजाय पुलिस बल का जमावड़ा केवल चालान काटने के लिए दिखाई देता है। यह स्थिति तब है, जब शहर के बाईपास और मुख्य मार्ग जर्जर अवस्था में हैं। सड़कों पर मौजूद जानलेवा गढ्ढे आए दिन दुर्घटनाओं को न्योता देते हैं, लेकिन प्रशासन की प्राथमिकता इन गढ्ढों को भरने के बजाय दुपहिया वाहन चालकों के सिर पर हेलमेट की जांच करना है। जनता के बीच यह धारणा बलवती हो रही है कि नियम केवल राजस्व वसूली का जरिया बनकर रह गए हैं, सुरक्षा का नहीं।
     ड्रेनेज सिस्टम की बदहाली और भ्रष्टाचार के कारण मामूली बारिश में भी सड़कें तालाब बन जाती हैं। घंटों तक ट्रैफिक जाम में फंसे रहना इंदौरवासियों की नियति बन चुका है। पार्किंग की कोई ठोस व्यवस्था न होने के कारण लोग सड़कों पर वाहन खड़े करने को मजबूर हैं, जिससे जाम की समस्या और विकराल हो जाती है। लेकिन प्रशासन का तंत्र इन बुनियादी ढांचागत कमियों को सुधारने के बजाय केवल दंडात्मक कार्रवाई में व्यस्त है। सड़क चौड़ीकरण के नाम पर एक ही मार्ग को बार-बार खोदना और महीनों तक उसे अधूरा छोड़ देना भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन का जीवंत उदाहरण है।
     इसके अतिरिक्त, शहर में बढ़ती नशाखोरी और असुरक्षा जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों पर जो तत्परता दिखनी चाहिए, वह नदारद है। नेताओं और रसूखदारों का काफिला जब सड़कों से गुजरता है, तो आम जनता को रोक दिया जाता है। जमीनी हकीकत से कटे हुए ये जनप्रतिनिधि शायद यह समझ ही नहीं पा रहे कि एक आम आदमी के लिए टूटी सड़क पर हेलमेट पहनकर धूल फांकना कितनी बड़ी मजबूरी है।
    इससे यह स्पष्ट होता है कि इंदौर को केवल हेलमेट पहनने वाले नागरिकों की नहीं, बल्कि एक जवाबदेह और दूरदर्शी प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता है। जब तक सड़कों की हालत नहीं सुधरती, अवैध पार्किंग पर लगाम नहीं लगती और भ्रष्टाचार मुक्त बुनियादी ढांचे का निर्माण नहीं होता, तब तक केवल हेलमेट के नाम पर की जा रही सख्ती जनता के घावों पर नमक छिड़कने जैसा ही है। शहर के बुद्धिजीवियों की खामोशी और प्रशासन की जिद ने इंदौर की यातायात व्यवस्था को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां नियम सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि प्रताड़ना का प्रतीक महसूस होने लगे हैं।

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