जबलपुर। घरेलू हिंसा और वैवाहिक विवाद में जब दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से समझौता हो चुका हो, तो इसके बाद भी आपराधिक मामला जारी रखना कानून का दुरुपयोग और प्रताड़ना है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने दहेज प्रताड़ना के एक मामले में दर्ज एफआईआर को निरस्त करते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि जब सक्षम अदालत के सामने महिला सभी लंबित मुकदमे वापस लेने की शर्त पर समझौता कर चुकी है, तो फिर क्रिमिनल केस को खींचना न्यायसंगत नहीं है।
समझौते के बाद भी मुकदमे से मुकरने पर कोर्ट का फैसला
मामला पन्ना जिले के निवासी तौसीफ राइन और उनके परिवार से जुड़ा है। तौसीफ का विवाह 25 दिसंबर 2017 को हुआ था। शादी के कुछ समय बाद पत्नी ससुराल छोड़कर चली गई और उसने साल 2020 में पति, सास-ससुर, देवर और विवाहित ननद के खिलाफ दहेज प्रताड़ना की एफआईआर दर्ज करा दी। इस बीच, घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम के तहत चल रही कानूनी कार्यवाही के दौरान दोनों पक्षों में आपसी सहमति बन गई। सक्षम अदालत ने इस समझौते को मंजूरी भी दे दी थी।
समझौते पत्र पर शिकायतकर्ता महिला के हस्ताक्षर थे, जिसमें उसने स्वीकार किया था कि उसे उसका पूरा स्त्रीधन, शादी का सामान, मेहर की राशि और कार वापस मिल चुकी है। साथ ही उसने सभी अदालती मामले वापस लेने का वादा भी किया था। इसके बावजूद पत्नी दहेज एक्ट के तहत दर्ज मुकदमा वापस लेने को तैयार नहीं हो रही थी, जिसके बाद याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का रुख किया।
रिश्तेदारों पर बेबुनियाद आरोप लगाना गलत
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता महिला ने याचिका का विरोध तो किया, लेकिन समझौता होने के बाद भी केस जारी रखने का कोई संतोषजनक कारण पेश नहीं कर सकी। एकलपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सास और ननद के खिलाफ बेहद सामान्य और सतही आरोप लगाए गए हैं। याचिकाकर्ता ननद शादीशुदा है और जबलपुर में अपने पति के साथ अलग रहती है।
अदालत ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि ननद को केवल पति की रिश्तेदार होने के कारण मामले में घसीटा गया है। केवल रिश्तेदारी के आधार पर परिजनों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही चलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
मुकदमेबाजी खींचने से न्याय नहीं मिलेगा
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब दोनों पक्षों के बीच वैवाहिक विवाद काफी हद तक समाप्त हो चुका है और स्त्रीधन की वापसी भी हो चुकी है, तब आपराधिक प्रक्रिया को जारी रखने से किसी को न्याय नहीं मिलेगा। इससे केवल मुकदमेबाजी लंबी खिंचेगी और पक्षों का उत्पीड़न होगा। इन्हीं तर्कों के आधार पर अदालत ने तौसीफ राइन और उनके परिजनों के खिलाफ दर्ज दहेज एक्ट की एफआईआर को पूरी तरह निरस्त कर दिया।