सौ साल पुरानी इंदौर की सराफा चाट-चौपाटी पर नया मोड़, हाई कोर्ट ने नगर निगम के आदेश को खारिज किया!
इंदौर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने सराफा चौपाटी को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने नगर निगम और व्यापारी संघों को यह स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें चाट-चौपाटी में दुकानों की संख्या तय करने का कोई कानूनी हक नहीं है। इसके साथ ही न्यायालय ने नगर निगम के उस विवादास्पद आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसके तहत चौपाटी पर केवल 80 दुकानें ही संचालित करने की सीमा तय की गई थी।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी निर्देश दिया है कि जिन दुकानदारों को वहां से हटाया गया था, उन्हें दोबारा अपना कारोबार शुरू करने की अनुमति दी जाए। न्याययूर्ति ने टिप्पणी की कि व्यापारी एसोसिएशन की सूची के आधार पर किसी भी विक्रेता को हटाना गलत है। जबकि, उसके पास संबंधित दुकान के मालिक की अनुमति और सहमति पहले से मौजूद है। जिस व्यक्ति के पास अपना ओटला या निजी स्थान है, वही यह तय करने का अधिकारी है कि वहां कौन सी दुकान लगेगी और कौन सी नहीं।
ऐतिहासिक चौपाटी और निगम का पुराना आदेश
इंदौर की यह प्रसिद्ध सराफा चाट-चौपाटी करीब एक सदी पुरानी यानी लगभग सौ साल पुरानी है। कुछ समय पहले नगर निगम ने एक निर्देश जारी कर इस चौपाटी पर लगने वाली दुकानों की अधिकतम संख्या 80 फिक्स कर दी थी। इस संख्या को तय करने के लिए दो मुख्य मानक बनाए गए थे, जिनमें पारंपरिक खान-पान की वस्तुएं बेचना और पिछले पांच साल से अधिक समय से वहां दुकान लगाना शामिल था।
हाई कोर्ट में दायर की गई थी याचिका
नगर निगम की इस एकतरफा कार्रवाई से प्रभावित होकर हटाए गए आठ दुकानदारों ने उच्च न्यायालय की शरण ली थी। इन दुकानदारों की तरफ से अधिवक्ताओं ने कोर्ट में याचिका प्रस्तुत की थी। मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने याचिका का निराकरण किया और निगम के आदेश को अवैध ठहराते हुए निरस्त कर दिया। कोर्ट ने दोहराया कि नगर निगम के पास चाट-चौपाटी में दुकानों की संख्या सीमित करने का कोई अधिकार नहीं है।
फैसले के मुख्य बिंदु
अदालत ने अपने निर्णय में यह भी साफ किया कि रात के समय जब स्थाई दुकानें पूरी तरह बंद हो जाती हैं, तब निजी दुकानों के सामने के गलियारों और परिसरों में खान-पान के ठेले या स्टॉल लगाए जाते हैं। यह क्षेत्र नगर निगम द्वारा आधिकारिक तौर पर घोषित कोई वेंडिंग जोन या चौपाटी नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में नगर निगम खुद को मकान मालिक या आवंटन प्राधिकारी के रूप में नहीं मान सकता है।
जब तक दुकान लगाने के कारण आम जनता के आने-जाने के मार्ग पर कोई पक्का या स्थाई अतिक्रमण नहीं होता, तब तक निगम यह तय नहीं कर सकता कि किसे दुकान लगाने देना है और किसे बाहर रखना है। चाट-चौपाटी पर स्टॉल लगाने वाले व्यापारी आभूषण दुकानों के मालिकों की आपसी सहमति से ही बैठते हैं। चूँकि यह स्थान दुकानदारों के निजी परिसरों के अंतर्गत आता है, इसलिए वे ही यह निर्णय लेंगे कि दुकान बंद रहने के बाद सामने की जगह का उपयोग कौन करेगा। इसमें नगर निगम का दखल देना अनुचित है।
इसके अलावा, अदालत ने यह भी कहा कि किसी निजी संघ के पास यह वैधानिक अधिकार नहीं है कि वह किसी दुकान मालिक द्वारा किसी विक्रेता को दी गई व्यक्तिगत सहमति को अमान्य कर सके। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि नगर निगम अपनी जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुक्त हो गया है। निगम को सराफा क्षेत्र में स्वच्छता बनाए रखने, ठोस कचरे का प्रबंधन करने, खाद्य सुरक्षा के मानकों की देखरेख करने, अग्निशामक सुरक्षा सुनिश्चित करने और आपातकालीन वाहनों के सुचारू आवागमन को नियंत्रित करने का पूरा अधिकार है। लेकिन निगम अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करके नागरिकों के संविधान प्रदत्त व्यापार करने के अधिकार को छीन नहीं सकता।
दुकानदारों के लिए राहत और निगम की नई भूमिका
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद हटाए गए दुकानदारों को बड़ी राहत मिली है। अदालत ने आदेश दिया है कि नगर निगम 80 विक्रेताओं की सीमित सूची वाले आदेश को तुरंत प्रभाव से रद्द करे और हटाए गए सभी दुकानदारों को फिर से व्यापार करने दे, बशर्ते उनके पास संबंधित स्थाई दुकान मालिकों की जरूरी अनुमति हो। अब नगर निगम का दायित्व केवल साफ-सफाई, खाद्य शुद्धता, फायर सेफ्टी के नियमों की निगरानी करने और सार्वजनिक रास्तों पर स्थाई कब्जा न होने देने तक ही सीमित रहेगा। यदि कोई विक्रेता स्वच्छता या कचरा प्रबंधन से जुड़े नियमों का उल्लंघन करता है, तभी निगम उसके खिलाफ नियमानुसार दंडात्मक कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगा।

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