बॉम्बे हाईकोर्ट की एफडीए को सख्त हिदायत, कहा कि कार्रवाई के नाम पर ताकत न दिखाएं!

मुंबई। महाराष्ट्र के खाद्य और औषधि प्रशासन (एफडीए) की कमान संभालते ही आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे की ताबड़तोड़ कार्रवाई चर्चा में आ गई है। हालांकि, कैडिला फार्मास्युटिकल्स पर की गई एक कड़क कार्रवाई के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने एफडीए के काम करने के तरीके पर कड़ा ऐतराज जताया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रविंद्र घुघे और गौतम अनखड की बेंच ने सुनवाई करते हुए स्पष्ट कहा कि प्रशासनिक फैसलों का मकसद सिर्फ ताकत का प्रदर्शन करना नहीं हो सकता।
अदालत ने टिप्पणी की कि एफडीए के पास ‘मच्छर को मारने के लिए तलवार’ जैसी असीमित शक्ति हो सकती है, लेकिन उसका इस्तेमाल न्यायसंगत और समझदारी से किया जाना चाहिए। ‘पहले गोली चलाना और बाद में सवाल पूछना’ जैसा तरीका वाइल्ड वेस्ट का नियम हो सकता है, लेकिन कानून के दायरे में यह तरीका बिल्कुल नहीं चलेगा।

दवाओं की कमी और मरीजों की परेशानी पर जताई चिंता
एफडीए ने कैडिला फार्मास्युटिकल्स की कुछ दवाओं की बिक्री और वितरण पर रोक लगाते हुए उनका पूरा स्टॉक जब्त कर लिया था। इसके खिलाफ कंपनी ने सीनियर एडवोकेट बिरेन्द्र सराफ के माध्यम से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और आदेश को मनमाना बताते हुए रद्द करने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने चिंता जाहिर की कि मामला सिर्फ कंपनी के आर्थिक नुकसान का नहीं है। अदालत के अनुसार, एफडीए की इस कार्रवाई से 20 दिन तक बाजार में दवाएं उपलब्ध नहीं रहीं और सुनवाई का समय आने तक यह अवधि 32 दिन हो चुकी थी। दवाओं की अनुपलब्धता का सीधा असर मरीजों पर पड़ता है, इसलिए कार्रवाई करते वक्त अधिकारियों को उसके व्यापक प्रभावों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

एफडीए की सफाई और आदेश वापस लेने का भरोसा
हाईकोर्ट के रुख के सामने सरकारी वकील ने एफडीए की कार्रवाई का बचाव किया। उन्होंने तर्क दिया कि कंपनी की कुछ दवाओं की ब्रांडिंग एक जैसी थी, जबकि उनमें मौजूद सक्रिय औषधीय घटक अलग-अलग थे। इससे मरीजों के बीच भ्रम पैदा हो सकता था और गलत दवा सेवन का खतरा बढ़ जाता। हालांकि, पीठ की तीखी टिप्पणी के बाद एफडीए ने अदालत में आश्वासन दिया कि कंपनी के खिलाफ पहले जारी किए गए ‘स्टॉप-सेल’ आदेश को वापस लिया जाएगा। प्रशासन ने भरोसा दिलाया कि यदि भविष्य में कोई उल्लंघन पाया जाता है, तो नियम के मुताबिक कारण बताओ नोटिस जारी किया जाएगा और कंपनी को अपना लिखित जवाब देने का पूरा मौका मिलने के बाद ही कोई न्यायसंगत आदेश पारित होगा।

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