कलेक्टर को पुलिस जांच और क्लोजर रिपोर्ट पर दखल देने का हक नहीं
इंदौर। हाई कोर्ट ने साफ लफ्जों में कहा है कि किसी भी क्रिमिनल केस में पुलिस द्वारा तैयार की गई क्लोजर रिपोर्ट को वापस लेने या मामले की री-इन्वेस्टिगेशन कराने का कानूनी अधिकार जिला कलेक्टर के पास नहीं है। जस्टिस जेके पिल्लई की सिंगल बेंच ने इस तरह के प्रशासनिक कदमों को न्यायिक प्रक्रिया में कार्यपालिका का नाजायज हस्तक्षेप माना है। इसी के साथ अदालत ने देवास कलेक्टर द्वारा 8 सितंबर 2025 को जारी किए गए उस आदेश और उससे जुड़े मेमो को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसे उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर लिया गया फैसला माना गया है।
पूरा विवाद और क्यों पहुंचे कोर्ट
यह पूरा विवाद ग्राम बावडिया में मौजूद 12.07 एकड़ जमीन की हेराफेरी से जुड़ा है। इस मामले में कोतवाली पुलिस स्टेशन में रामरतन अग्रवाल और देवास के बिजनेसमैन दीपक मनुलाल गर्ग के खिलाफ एक एफआईआर दर्ज की गई थी। पुलिस ने जब अपनी जांच पड़ताल पूरी की, तो उन्हें आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं मिले। इसके बाद थाना प्रभारी ने कानून के मुताबिक कार्रवाई करते हुए 7 मई और 21 मई 2024 को इस केस की क्लोजर रिपोर्ट कोर्ट में सबमिट कर दी थी।
कलेक्टर को क्लोजर रिपोर्ट वापस लेने पर विवाद
मामले में नया मोड़ तब आया जब देवास कलेक्टर ने अपने स्तर पर एक आदेश जारी कर पुलिस को निर्देश दिए कि वे कोर्ट से क्लोजर रिपोर्ट वापस लें और इस पूरे मामले की नए सिरे से जांच शुरू करें। कलेक्टर के इसी आदेश को आधार बनाते हुए बिजनेसमैन दीपक मनुलाल गर्ग ने न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पुलिस और मजिस्ट्रेट के अधिकारों को रेखांकित किया। अदालत ने कहा कि एफआईआर दर्ज होने के बाद पूरी निष्पक्षता से जांच करना पुलिस की लीगल ड्यूटी है। जब पुलिस अपनी अंतिम रिपोर्ट यानी क्लोजर रिपोर्ट तैयार कर लेती है, तो उसे सीधे सक्षम मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है। एक बार जब कोई मामला अदालत की चौखट पर पहुंच जाता है, तो उस पर आगे का कोई भी एक्शन लेने की ताकत सिर्फ और सिर्फ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के पास सुरक्षित होती है। मजिस्ट्रेट के पास यह विकल्प होता है कि वह चाहे तो पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को मंजूर कर ले, या फिर उसे नामंजूर करके खुद संज्ञान ले ले, अथवा पुलिस को आगे की और जांच करने का आदेश दे दे।
मॉनिटरिंग का अधिकार नहीं
अदालत ने सख्त लहजे में स्पष्ट किया कि भले ही कानून में आगे की जांच की गुंजाइश होती है, लेकिन यह कदम किसी जिला कलेक्टर के इशारे पर नहीं उठाया जा सकता। कलेक्टर के पास न तो पुलिस इन्वेस्टिगेशन की मॉनिटरिंग करने का कोई पावर है और न ही वे क्लोजर रिपोर्ट को वापस मंगवा सकते हैं। हाईकोर्ट ने इसे कानून के राज के खिलाफ मानते हुए कलेक्टर के 8 सितंबर 2025 के आदेश और उसके बाद के सभी सरकारी मेमो को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है।