जनजातीय विभाग में 2.98 करोड़ का घोटाला, झाबुआ के 4 अफसरों पर ईओडब्ल्यू ने एफआईआर की


आरोपियों ने भ्रष्टाचार के लिए सुनियोजित तरीके से नियमों का उल्लंघन

झाबुआ/इंदौर। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) इंदौर ने झाबुआ जिले में एक बड़े भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया। जनजातीय कार्य विभाग में पदस्थ रहे तत्कालीन अधिकारियों द्वारा सामग्री खरीदी के नाम पर करोड़ों रुपये का वारा-न्यारा करने का मामला सामने आया है। ईओडब्ल्यू ने जांच के बाद तत्कालीन सहायक आयुक्त सहित चार अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की।

नियमों को ताक पर रखकर खरीदी

विभाग को शिकायत मिली थी कि वर्ष 2013-14 से 2019-20 के बीच विभाग में नियमों को ताक पर रखकर सामग्री की खरीदी की गई। जांच में यह पुष्टि हुई कि अधिकारियों ने मिलीभगत कर सरकारी खजाने को 2,98,41,738 रुपये (2 करोड़ 98 लाख 41 हजार 738) की चपत लगाई है।

इन अधिकारियों पर नामजद एफआईआर

ईओडब्ल्यू की जांच में चार प्रमुख अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई। इनके खिलाफ मामला पंजीबद्ध किया गया है

● प्रशांत आर्य : तत्कालीन सहायक आयुक्त, जनजातीय कार्य विभाग, झाबुआ।

● भारत सिंह : तत्कालीन एपीएआईटीडीपी एवं सहायक परियोजना प्रशासक (आदिवासी विकास),झाबुआ।

● अयूब खान : तत्कालीन भंडार शाखा प्रभारी (लेखापाल) झाबुआ।

● राघवेंद्र सिसोदिया : तत्कालीन बजट शाखा प्रभारी, जनजातीय कार्य विभाग झाबुआ।

कागजों में खरीदी, मौके से हस्ताक्षर गायब

जांच एजेंसी ने पाया कि आरोपियों ने भ्रष्टाचार करने के लिए सुनियोजित तरीके से नियमों का उल्लंघन किया। वर्ष 2013-14 में अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्र-छात्राओं के लिए शासन द्वारा निर्धारित फर्मों से सामग्री खरीदने की बात कही गई थी। इसके लिए छात्रावासों और स्कूलों से मांग-पत्र भी दिखाए गए, लेकिन जब वितरण की जांच की गई, तो अभिलेखों में प्राप्तकर्ताओं के हस्ताक्षर ही नहीं मिले। इससे यह संदेह गहरा गया कि सामग्री वास्तव में वितरित हुई भी थी या नहीं।

हस्ताक्षर ही गायब मिले

इसी तरह, वर्ष 2014-15 से 2019-20 के दौरान संस्थाओं से निर्धारित प्रारूप में मांग-पत्र नहीं लिए गए। जो मांग-पत्र उपलब्ध थे, उन पर भी पालक समिति के अध्यक्ष और विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) के अनिवार्य हस्ताक्षर नदारद थे। जांच में तत्कालीन सहायक परियोजना प्रशासक भारत सिंह की भूमिका भी अहम पाई गई। आरोप है कि उन्होंने वर्ष 2015-16 से 2019-20 तक कार्यालयों, छात्रावासों और आश्रमों के संचालन के लिए स्टेशनरी, डस्टबिन, शू-स्टैंड और बर्तन जैसी सामग्री की खरीदी मनमाने ढंग से की।

संदिग्ध बिलों के माध्यम से भुगतान

नियमों के मुताबिक, सरकारी खरीदी के लिए टेंडर प्रक्रिया और दरों का निर्धारण जरूरी होता है। लेकिन, अधिकारियों ने भंडार क्रय नियमों का पालन किए बिना स्थानीय विक्रेताओं से सीधा माल खरीदा। जांच में पाया गया कि आरोपियों ने आपसी सांठ-गांठ कर संदिग्ध बिलों के माध्यम से संबंधित फर्मों को भुगतान किया और अपने पद का दुरुपयोग करते हुए शासन को करोड़ों की आर्थिक क्षति पहुंचाई।

चारों पर कानूनी कार्रवाई

तथ्यों और सबूतों के आधार पर ईओडब्ल्यू ने चारों आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 409 (सरकारी कर्मचारी द्वारा विश्वास का आपराधिक हनन), 120-बी (आपराधिक साजिश) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(d) व 13(2) के तहत अपराध दर्ज कर विवेचना शुरू कर दी है। यह शिकायत आदिवासी मोर्चा झाबुआ के अध्यक्ष एवं अन्य द्वारा की गई थी, जिसके बाद यह कार्रवाई अमल में लाई गई है।

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