चेक बाउंस मामलों में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, परिवार के सदस्य को नोटिस मिलना भी मान्य!
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस के एक मामले में कहा है कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के तहत भेजा गया कानूनी नोटिस अगर चेक जारी करने वाले व्यक्ति के सही पते पर रजिस्टर्ड डाक से पहुंच गया है, तो सिर्फ इस आधार पर उसे अमान्य नहीं माना जा सकता कि नोटिस आरोपी को खुद न मिलकर उसके परिवार के किसी सदस्य ने लिया था। न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने केरल हाई कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी की सजा यह कहते हुए खत्म कर दी गई थी कि नोटिस उसे नहीं, बल्कि उसकी मां को मिला था।

पता सही था मतलब नोटिस मिल गया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सही पते पर भेजे गए नोटिस की डाक से तामील होने पर यह माना जाएगा कि नोटिस मिल गया है। अब आरोपी को यह साबित करना होगा कि उसका पता गलत था, उसे नोटिस की जानकारी नहीं मिली या डाक विभाग की ओर से डिलीवरी को लेकर गलत जानकारी दर्ज की गई थी। आरोपी ऐसा साबित नहीं कर पाता है तो नोटिस की तामील पूरी मानी जाएगी।
3 लाख रुपए के कर्ज से शुरू हुआ मामला
मामला 3 लाख रुपए के कर्ज से जुड़ा था। कर्ज चुकाने के लिए दिए गए चेक के बाउंस होने के बाद शिकायतकर्ता ने 31 अगस्त 2016 को आरोपी के पते पर रजिस्टर्ड डाक से कानूनी नोटिस भेजा था। नोटिस आरोपी की मां अमीना ने लिया था। भुगतान नहीं होने पर निचली अदालत ने 10 जुलाई 2019 को आरोपी को दोषी ठहराते हुए छह महीने की कैद और 3 लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई। अपीलीय अदालत ने भी यह सजा कायम रखी।
केरल हाई कोर्ट ने रद्द कर दी थी सजा
इसके बाद आरोपी ने केरल हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाई कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि नोटिस आरोपी को व्यक्तिगत रूप से नहीं मिला था। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने दोषसिद्धि रद्द कर दी। शिकायतकर्ता ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सही पते पर भेजे गए नोटिस के मामले में यह जरूरी नहीं कि आरोपी ने खुद उसे हाथ में लिया हो या उसके बारे में अलग से यह साबित किया जाए कि उसने जानबूझकर नोटिस लेने से इनकार किया था। अदालत ने कहा कि नोटिस सही पते पर पहुंचने के बाद उसकी तामील मानी जाएगी, हालांकि आरोपी को यह साबित करने का मौका रहेगा कि ऐसा अनुमान सही नहीं है।
सही पते पर पहुंचा समन
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि आरोपी ने समन मिलने से लेकर अदालत में सुनवाई के दौरान कहीं भी अपने पते को गलत नहीं बताया था। ऐसा कोई सबूत भी सामने नहीं आया जिससे यह पता चले कि आरोपी अपनी मां से अलग रहता था या मां को मिला नोटिस उसके लिए जानना संभव नहीं था। इन परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत और अपीलीय अदालत के फैसले को सही माना और आरोपी की सजा कायम रखी।

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