दुर्ग। छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को विश्व स्तर पर एक नई और अमिट पहचान देने वाली विश्वविख्यात पंडवानी गायिका पद्म विभूषण डॉ तीजन बाई का निधन हो गया। उन्होंने रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में अपनी अंतिम सांस ली। लगभग एक महीने से उनकी तबीयत बेहद नाजुक थी। ‘एम्स’ के सूत्रों के अनुसार, उन्होंने 27 मई से अस्पताल में भर्ती होने के बाद शनिवार तड़के करीब 3.15 बजे अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर फैलते ही पूरे छत्तीसगढ़ समेत देश-विदेश के कला जगत और उनके लाखों प्रशंसकों में शोक छा गया।
गनियारी से वैश्विक मंचों तक का सफर
दुर्ग जिले के एक छोटे से गांव गनियारी में जन्मी तीजन बाई का बचपन बेहद संघर्षपूर्ण रहा। उन्होंने महज 13 वर्ष की अल्पायु में अपने नाना ब्रजलाल पारधी से पंडवानी गायन की प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की थी। उस दौर में महिलाओं का मंच पर आकर इस तरह का प्रदर्शन करना सामाजिक रूप से सहज स्वीकार्य नहीं था, परंतु उन्होंने तमाम सामाजिक बंधनों और रूढ़ियों को तोड़ते हुए अपनी कला को जीवित रखा। अपनी अद्भुत प्रतिभा, अद्वितीय अभिनय क्षमता और कापालिक शैली की दमदार प्रस्तुतियों से उन्होंने महाभारत की पौराणिक कथाओं को मंच पर इस तरह जीवंत किया कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। हाथ में तंबूरा लेकर जब वे बुलंद आवाज में ‘भीम’ या ‘अर्जुन’ के शौर्य का वर्णन करती थीं, तो पूरा माहौल वीर रस से भर जाता था।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ी संस्कृति का परचम
तीजन बाई ने पंडवानी को केवल छत्तीसगढ़ या भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे सुदूर सात समंदर पार तक पहुंचाया। उन्होंने एशिया महाद्वीप के विभिन्न देशों के अलावा यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया सहित दर्जनों देशों में अपनी प्रस्तुतियां दीं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जब वे अपनी पारंपरिक वेशभूषा में छत्तीसगढ़ी बोली और विधा में गर्जना करती थीं, तो विदेशी दर्शक भी बिना भाषा समझे उनके अभिनय के कायल हो जाते थे। भारत सरकार ने कला के क्षेत्र में उनके इसी अप्रतिम और ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित करते हुए वर्ष 1988 में उन्हें पद्मश्री, वर्ष 2003 में पद्म भूषण और फिर वर्ष 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से अलंकृत किया था। इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नृत्य शिरोमणि, कला शिरोमणि जैसी अनेकों प्रतिष्ठित राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय उपाधियों के साथ-साथ मानद डी.लिट् की उपाधि से भी नवाजा गया था।
राजकीय सम्मान के साथ पैतृक गांव में अंतिम विदाई
तीजन बाई पिछले एक महीने से बेहद गंभीर स्थिति में थीं। अस्वस्थता के कारण वे ठोस भोजन ग्रहण करने में पूरी तरह असमर्थ थीं और केवल जूस तथा अन्य तरल पेय पदार्थों के सहारे उनका उपचार चल रहा था। डॉक्टरों की एक विशेष टीम लगातार उनकी निगरानी कर रही थी, परंतु उम्र और बढ़ती शारीरिक शिथिलता के कारण उन्हें बचाया नहीं जा सका। वे अपने पीछे बेटा, बहू और नातिन से भरा-पूरा परिवार छोड़ गई हैं, जिनके साथ वे अपने अंतिम दिनों तक गनियारी गांव में ही निवास कर रही थीं।
तीजन बाई का अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव गनियारी में ही किया गया। लोकसंस्कृति की इस महान साधिका के पार्थिव शरीर को पूरे राजकीय सम्मान (स्टेट ऑनर) और उनकी पारंपरिक सामाजिक रीति-रिवाजों के साथ पंचतत्व में विलीन किया गया। उनके अंतिम दर्शन के लिए क्षेत्र के हजारों ग्रामीणों सहित कला जगत के दिग्गजों और राजनेताओं के पहुंचने की संभावना है।
एक स्वर्णिम युग का अंत और अमर विरासत
तीजन बाई का इस संसार से विदा होना केवल एक महान कलाकार का निधन नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति के एक बेहद समृद्ध और स्वर्णिम युग का अवसान है। उन्होंने लोक कला को जो गरिमा और अंतरराष्ट्रीय गौरव दिलाया, उसकी भरपाई कर पाना आने वाले कई दशकों तक संभव नहीं होगा। तंबूरे को कभी गदा तो कभी धनुष बनाकर मंच पर तहलका मचाने वाली उनकी वह बुलंद आवाज भले ही अब हमेशा के लिए मौन हो गई हो, परंतु पंडवानी की जो अमूल्य विरासत वे छोड़कर जा रही हैं, वह आने वाली पीढ़ियों के लोक कलाकारों को सदैव प्रेरित और मार्गदर्शित करती रहेगी।