दमोह रेलवे स्टेशन पर ठंड में कांपती इंसानियत, जमीन ही बिस्तर, पन्नी ही कंबल बना

करोड़ों के विकास दावों के बीच यात्रियों के लिए रैन बसेरा नहीं, न ठीक प्रतीक्षालय

दमोह। एक ओर रेलवे विकास के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च करने के दावे कर रहा है, दूसरी तरफ दमोह रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की स्थिति मानवता को शर्मसार कर रही। कड़ाके की ठंड और शीतलहर के बीच स्टेशन परिसर में लोग जमीन को बिस्तर और पन्नी को कंबल बनाकर रात गुजारने को मजबूर हैं। खुले आसमान के नीचे ठिठुरते बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे और मजदूर हर रात ऐसे हालात झेल रहे हैं, मानो उनकी पीड़ा किसी की जिम्मेदारी ही नहीं।

लगातार गिरते तापमान में जहां कुछ देर खड़ा रहना मुश्किल है, वहीं स्टेशन पर न कंबल की व्यवस्था है, न अस्थायी रैन बसेरे की और न ऐसा बंद प्रतीक्षालय, जहां यात्री राहत पा सकें। किसी के पास पन्नी है, तो कोई बोरी या अखबार में खुद को लपेटकर ठंड से बचने की कोशिश करता दिखाई देता है। यह केवल अव्यवस्था नहीं, बल्कि यात्रियों की जान के साथ सीधा खिलवाड़ है।

बताया गया कि दमोह रेलवे स्टेशन पर 30 करोड़ रुपए से अधिक के विकास कार्य चल रहे हैं। प्लेटफॉर्म चमकाए जा रहे हैं, दीवारें रंगी जा रही हैं। लेकिन, आम यात्रियों के लिए बैठने या सुरक्षित तरीके से रात बिताने की बुनियादी सुविधा तक उपलब्ध नहीं। 

प्लेटफॉर्म और खुले परिसर में यात्री जमीन पर पड़े रहे, कई पूरी रात ठंड के कारण करवटें बदलते रहे। यह हालात रेलवे के विकास मॉडल पर सवाल खड़े करते हैं। जब ठंड में यात्रियों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित नहीं हो पा रहा, तो ऐसे विकास का क्या अर्थ है?

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