10 हजार लीटर पानी लगता है 1 लीटर इथेनॉल बनाने में, चावल से तेल की कीमत कौन चुकाएगा! नीति आयोग की ‘समग्र जल प्रबंधन सूचकांक’ रिपोर्ट में यह डरावनी वाली चेतावनी

    नई दिल्ली। इथेनॉल को ‘ग्रीन फ्यूल’ बताकर बढ़ावा देने की नीति अब गंभीर सवालों के घेरे में है। चावल आधारित इथेनॉल उत्पादन में पानी की भारी खपत भविष्य में जल संकट का बड़ा कारण बन सकती है। विशेषज्ञ इसे ऊर्जा सुरक्षा नहीं, बल्कि जल और खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा मान रहे हैं। एक लीटर चावल-आधारित इथेनॉल के प्रोडक्शन में करीब 10,790 लीटर पानी की खपत होती है।
   भारत में पेट्रोल के विकल्प के तौर पर इथेनॉल को जिस तरह ‘क्रांति’ बताया जा रहा है, वह दरअसल ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर एक बड़ा ‘नीतिगत धोखा’ और आने वाले जल संकट की भयावह आहट है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस धान की खेती को ‘पानी का दुश्मन’ बताकर पंजाब-हरियाणा के किसानों को विलेन की तरह पेश किया गया, आज उसी अनाज को ‘ग्रीन फ्यूल’ की भट्टी में झोंका जा रहा है।

जल संकट के दौर में इथेनॉल की वकालत
     एक तरफ नीति आयोग 2030 तक देश के कई बड़े शहरों में जल संकट की चेतावनी दे रहा है, तो दूसरी तरफ सरकार मात्र 1 लीटर चावल-आधारित इथेनॉल के लिए करीब 10,790 लीटर बेशकीमती पानी स्वाहा कर 95 लाख टन अनाज बर्बाद करने की तैयारी में है। ग्रीन फ्यूल का यह मुखौटा दरअसल, आम आदमी की थाली और आने वाली नस्लों के पानी की बलि पर टिका है, जो एक गंभीर पर्यावरण संकट को व्यापारिक मुनाफे में बदलने का सोची-समझी साजिश जैसा दिखता है।
      यह एक गंभीर नीतिगत विडंबना है, कि जिन किसानों को कभी धान की खेती के लिए कटघरे में खड़ा किया गया, आज उन्हीं के उगाए चावल को ‘ग्रीन फ्यूल’ के नाम पर कंपनियों को कौड़ियों के दाम देकर बर्बाद किया जा रहा है, जो न केवल जल संकट को खुला आमंत्रण है बल्कि टैक्सपेयर्स के पैसे का भी साफ-साफ दुरुपयोग है।

डराने वाली रिपोर्ट
     नीति आयोग की ‘समग्र जल प्रबंधन सूचकांक’ रिपोर्ट जब यह डरावनी चेतावनी दे रही है, कि 2030 तक दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे 21 बड़े शहरों का भूजल ‘शून्य’ होकर दम तोड़ देगा। तब चावल से इथेनॉल बनाने की यह सरकारी जिद सीधे तौर पर ‘आत्मघाती’ कदम जान पड़ती है। ऊर्जा सुरक्षा के छलावे में अन्न और जल की यह बर्बादी दरअसल भविष्य की पीढ़ियों की प्यास और उनके अस्तित्व का एक क्रूर नीतिगत सौदा है, जो आने वाले समय में एक जल त्रासदी का आधार तैयार कर रहा है।

डरावनी तस्वीर : एक लीटर इथेनॉल में हजारों लीटर पानी
      खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने 27 सितंबर 2024 को नई दिल्ली में ISMA (इंडियन शुगर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन) द्वारा आयोजित एक वैश्विक सम्मेलन के दौरान बताया था कि चावल से 1 लीटर इथेनॉल बनाने के लिए 10,790 लीटर, मक्के से 4,670 लीटर और गन्ने से 3,630 लीटर पानी की आवश्यकता होती है. इसमें धान की खेती के दौरान सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाला पानी भी शामिल है। सामान्य तौर पर, 1 किलो चावल उगाने के लिए लगभग 3,000 लीटर पानी खर्च होता है. चूंकि 1 टन (1000 किलो) चावल से लगभग 470 लीटर इथेनॉल बनता है, इसलिए केवल फसल उगाने के अनुपात में ही प्रति लीटर इथेनॉल पर हजारों लीटर पानी का भार आता है।

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