सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, आचरण में लंबा सुधार सजा कम करने का ठोस आधार !

नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने सजा के निर्धारण को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और मानवीय टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि यदि किसी दोषी के खिलाफ एक लंबे वक्त तक दोबारा किसी भी तरह की आपराधिक गतिविधि में शामिल होने का कोई सबूत नहीं मिलता है, तो अदालत को सजा तय करते समय इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की खंडपीठ ने इस महत्वपूर्ण पहलू को रेखांकित करते हुए एक दोषी को बड़ी राहत दी है। अदालत ने उसकी पांच वर्ष की जेल की सजा को घटाकर उसके द्वारा पहले से जेल में बिताई जा चुकी अवधि तक ही सीमित कर दिया है।

आरोपी पर धोखाधड़ी का मामला
यह पूरा मामला एक फर्जी राजस्व दस्तावेज (रेवेन्यू डॉक्यूमेंट) से जुड़ा हुआ है। दोषी व्यक्ति ने अदालती कार्यवाही के दौरान जमानतदार बनने के लिए इस जाली दस्तावेज का इस्तेमाल किया था। इसके बाद पुलिस और अभियोजन पक्ष ने उसके खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया। निचली अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 467, 468 और 471 के तहत कसूरवार पाया था। अदालत ने उसे इन सभी धाराओं के तहत अलग-अलग 5-5 वर्ष के कठोर कारावास और 1000-1000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। नियम के मुताबिक ये सभी सजाएं एक साथ चलनी थीं। बाद में जब यह मामला हाई कोर्ट पहुंचा, तो वहां भी उसकी दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा गया। इसके बाद न्याय की गुहार लेकर दोषी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

दशकों पुराना मुकदमा, आदतन अपराधी न होने की दलील
सर्वोच्च अदालत में दोषी की तरफ से दोषसिद्धि को चुनौती देने के बजाय केवल सजा की अवधि को कम करने का अनुरोध किया गया। दोषी के वकील ने दलील दी कि उनका मुवक्किल कोई पेशेवर या आदतन अपराधी नहीं है। उसके खिलाफ पहले का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और न ही इस घटना के बाद उसने दोबारा कोई अपराध किया है। दलील में यह भी कहा गया कि वह वर्ष 2014 से इस कानूनी प्रक्रिया और मुकदमे का सामना कर रहा है। यानी एक दशक (10 वर्ष) से अधिक का समय वह अदालतों के चक्कर काटने में बिता चुका है।

आरोपी आदतन अपराधी नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी दलीलों को स्वीकार कर लिया। पीठ ने रिकॉर्ड को खंगालने के बाद पाया कि ऐसा कोई सबूत मौजूद नहीं है जो यह साबित करे कि आरोपी आदतन अपराध करता है। अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि लंबे समय तक किसी अन्य अपराध में शामिल न होना सजा घटाने का एक बेहद प्रासंगिक और मजबूत आधार है। न्यायपीठ ने अपने पुराने फैसलों का संदर्भ देते हुए कहा कि सजा तय करते समय अदालतों को अपराध के तरीके, मामले के हालात, आरोपी की भूमिका और उसके द्वारा जेल में पहले से काटे गए वक्त के बीच एक सही संतुलन बनाना चाहिए। अदालत के अनुसार, सजा देने का मकसद सिर्फ बदला लेना नहीं हो सकता, बल्कि इसमें समानुपातिकता (प्रपोरशनैलिटी) का सिद्धांत और दोषी के व्यक्तिगत हालात भी मायने रखते हैं। इसी आधार पर अदालत ने उसकी अपील मंजूर करते हुए जेल की अवधि को पहले से काटी गई सजा तक सीमित कर दिया।

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