सिंधिया राजघराने की संपत्तियों के बंटवारे में ऐतिहासिक समझौता पत्र बनेगा मुख्य आधार

सिंधिया राजघराने की संपत्तियों के बंटवारे में ऐतिहासिक समझौता पत्र बनेगा मुख्य आधार

ग्वालियर। जिला अदालत में मध्य भारत के गठन से जुड़े लगभग 78 वर्ष पुराने ऐतिहासिक दस्तावेज ‘द कोवेनेंट’ यानी विलय पत्र को संपत्ति विवाद की फाइल में मुख्य आधार के रूप में पेश किया गया है। यह दस्तावेज 13 अगस्त 1948 को भारत सरकार और तत्कालीन मध्य भारत सरकार के बीच हस्ताक्षरित हुआ था, जिसके तहत राजघराने की सरकारी और निजी संपत्तियों को अलग-अलग श्रेणी में बांटा गया था। लगभग 40 हजार करोड़ रुपये की संपत्ति से जुड़े इस मुकदमे की अगली सुनवाई 28 जुलाई को तय की गई है।

1948 के विलय पत्र में दर्ज थीं यह प्रमुख संपत्तियां
रियासतों के विलय के समय तैयार किए गए इस सरकारी दस्तावेज में महाराजा की निजी संपत्तियों की सूची स्पष्ट की गई थी। इसके अंतर्गत ग्वालियर का प्रसिद्ध जय विलास पैलेस, साख्या विलास, सुसेरा कोठी, शिवपुरी का माधव विलास पैलेस तथा जॉर्ज कैसल कोठी शामिल थे। इसके अतिरिक्त दिल्ली स्थित दिल्ली कोठी और पुणे के पद्मा विलास को भी तत्कालीन महाराजा की व्यक्तिगत संपत्ति के रूप में मान्यता दी गई थी। कानूनी मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार, अदालत में चल रहे इस विवाद को सुलझाने में यह दस्तावेज काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला है।

पारिवारिक समझौते के बीच कैविएट याचिका से नया मोड़
इस पूरे मामले में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और पूर्व मंत्री यशोधरा राजे समेत राजपरिवार के सदस्यों द्वारा विभिन्न न्यायालयों में फैमिली सेटलमेंट यानी पारिवारिक समझौते का मसौदा प्रस्तुत किया गया है। इसी बीच, स्वर्गीय पद्मा राजे सिंधिया की बेटी प्रतिमा देवी द्वारा कोर्ट में कैविएट दाखिल करने से मामले में नया मोड़ आ गया है। उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि प्रस्तावित समझौते से उनके कानूनी अधिकार प्रभावित हो रहे हैं, इसलिए उनका पक्ष सुने बिना कोई भी अंतिम फैसला न सुनाया जाए।

पद्मा राजे की बेटियां भी जता रही हैं अपना विधिक अधिकार
त्रिपुरा राजघराने में विवाह करने वाली पद्मा राजे सिंधिया के निधन के पश्चात उनकी दो पुत्रियां कानूनी उत्तराधिकारी के रूप में इस मामले से जुड़ी हुई हैं। पहली पुत्री प्रतिमा देवी, जिनका विवाह नेपाल के राणा परिवार के डॉ धवल शमशेर राणा से हुआ है, उन्होंने अपनी दिवंगत मां के हिस्से पर अपना दावा प्रस्तुत किया है। वहीं दूसरी पुत्री राजकुमारी रमा राजे भी इस जायदाद के मामलों में अपनी मां के अधिकारों के तहत हिस्सेदारी मांग रही हैं।

प्रिवी पर्स और राजघराने की संपत्ति का प्रामाणिक ब्यौरा
1948 के इस मूल विलय पत्र की प्रति को दिल्ली स्थित भारत सरकार के नोटरी द्वारा प्रमाणित किया गया है। इस प्रामाणिक प्रतिलिपि में मध्य भारत की विभिन्न रियासतों के राजाओं को मिलने वाले भत्ते जिन्हें प्रिवी पर्स कहा जाता था, उनका और ग्वालियर राजघराने की अरबों रुपये की निजी संपत्तियों का पूरा विवरण दिया गया है। अदालत में पेश किया गया यह प्रामाणिक रिकॉर्ड अब संपत्ति के अंतिम निपटारे की दिशा में सबसे निर्णायक साक्ष्य माना जा रहा है।

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