शोक में डूबा क्रिकेट जगत : नहीं रहे Rinku Singh के पिता खानचंद, संघर्षों की छांव में बेटे को बनाया ‘सिक्सर किंग’

शोक में डूबा क्रिकेट जगत : नहीं रहे Rinku  Singh के पिता खानचंद, संघर्षों की छांव में बेटे को बनाया ‘सिक्सर किंग’

शोक में डूबा क्रिकेट जगत: Rinku Singh के पिता खानचंद का निधन

नई दिल्ली/अलीगढ़: भारतीय क्रिकेट के उभरते सितारे Rinku Singh के पिता, खानचंद सिंह का लीवर कैंसर (स्टेज-4) के कारण निधन हो गया है। उन्होंने ग्रेटर नोएडा के यथार्थ अस्पताल में अंतिम सांस ली। वह पिछले कुछ दिनों से अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे थे।

अंतिम समय में भी कर्तव्य की राह पर रिंकू ​

अपने पिता की नाजुक हालत की खबर मिलते ही रिंकू सिंह T20 वर्ल्ड कप 2026 के बीच से भारत लौट आए थे। पिता से मिलने के बाद, वह टीम के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए जिम्बाब्वे के खिलाफ मैच से पहले वापस जुड़ गए थे। हालांकि उस मैच की अंतिम एकादश में वह शामिल नहीं थे, लेकिन मैदान पर फील्डिंग करते हुए उनके जज्बे ने सबका दिल जीत लिया था।

शोक में डूबा क्रिकेट जगत: Rinku Singh के पिता खानचंद का निधन

कंधे पर सिलेंडर और आंखों में बेटे का सपना ​रिंकू सिंह की सफलता किसी चमत्कार से कम नहीं है, और इसके पीछे उनके पिता का खून-पसीना लगा है।

​हॉकर से नायक तक : खानचंद सिंह अलीगढ़ की एक गैस एजेंसी में सिलेंडर पहुंचाने (हॉकर) का काम करते थे।

अभावों में क्रिकेट : दो कमरों के छोटे से मकान में पांच बेटों और एक बेटी के बड़े परिवार का पालन-पोषण करते हुए भी उन्होंने कभी रिंकू के सपनों के बीच गरीबी को नहीं आने दिया।

पहली किट का प्रबंध : सिलेंडर ढोकर होने वाली मामूली कमाई से ही खानचंद ने रिंकू को बल्ला और गेंद दिलाए थे। ​

“रिंकू के कोच मसूद जफर अमीनी बताते हैं कि खानचंद ही रिंकू को अलीगढ़ के स्टेडियम लेकर आए थे। उन्होंने रिंकू पर कभी घर की जिम्मेदारियों का बोझ नहीं डाला, ताकि उनका बेटा सिर्फ अपने खेल पर ध्यान दे सके।”

35 नंबर की जर्सी और वो ऐतिहासिक पांच छक्के ​रिंकू के करियर में 35 नंबर की जर्सी काफी भाग्यशाली रही। 2012 के स्कूल वर्ल्ड कप में इसी जर्सी को पहनकर उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया था। आईपीएल में जब उन्होंने दोबारा 35 नंबर अपनाया, तो उनकी किस्मत चमक उठी।

​गुजरात टाइटंस के खिलाफ वो अविस्मरणीय रात

क्रिकेट प्रेमी उस मैच को कभी नहीं भूल सकते जब आखिरी ओवर में जीत के लिए 29 रनों की दरकार थी। पूरा परिवार टीवी के सामने बैठा था। रिंकू के भाई जीतू याद करते हैं कि उम्मीदें लगभग खत्म हो चुकी थीं, लेकिन रिंकू ने लगातार 5 छक्के जड़कर हारी हुई बाजी पलट दी। उस जीत ने न केवल रिंकू को रातों-रात स्टार बनाया, बल्कि अलीगढ़ की गलियों में खुशियों का सैलाब ला दिया था।

​सफलता के सूत्रधार

​रिंकू की इस यात्रा में उनके पिता के अलावा अर्जुन सिंह फकीरा और कोच मसूदुज्जफर अमीनी का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिन्होंने रिंकू की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें तराशा। आज रिंकू के पास शोहरत और दौलत दोनों है, लेकिन जिस पिता ने इस नींव को रखा, उनका जाना पूरे खेल जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

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