नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार पर लगाम कसने वाली संस्था लोकायुक्त के विशेष पुलिस स्थापना विंग को सूचना के अधिकार (आरटीआई) से बाहर रखने के प्रदेश सरकार के फैसले पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने बेहद सख्त रुख अपनाया। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2011 में जारी की गई उस अधिसूचना पर गंभीर आपत्ति जताई है जिसके तहत लोकायुक्त पुलिस को इस जनहितैषी कानून के दायरे से मुक्त कर दिया गया था। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने सूबे के मुख्य सचिव और महाधिवक्ता को औपचारिक नोटिस भेजकर जवाब तलब किया है, साथ ही संतोषजनक स्पष्टीकरण न मिलने पर इस छूट को पूरी तरह से निरस्त करने की चेतावनी भी दी है।
लोकायुक्त की तुलना खुफिया एजेंसी से करने पर गंभीर सवाल
न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस चांदुरकर की खंडपीठ के समक्ष जब इस मामले की सुनवाई शुरू हुई, तो अदालत ने सबसे पहला सवाल लोकायुक्त की प्रकृति को लेकर उठाया। पीठ ने तीखे लहजे में पूछा कि क्या लोकायुक्त कोई खुफिया तंत्र या देश की सुरक्षा से जुड़ा संगठन है।
कानूनी प्रावधानों के अनुसार, सूचना के अधिकार कानून की धारा 24(4) राज्य सरकारों को केवल और केवल देश की सुरक्षा या खुफिया जानकारी से जुड़े विभागों को ही इस कानून से दूर रखने का अधिकार देती है। अदालत ने कहा कि राज्य शासन के पास ऐसा कोई ठोस दस्तावेज या तर्क नहीं है जो यह सिद्ध कर सके कि लोकायुक्त पुलिस इस श्रेणी में आती है। ऐसे में बिना किसी कानूनी आधार के लोकायुक्त को जनता के प्रति जवाबदेही से मुक्त करना सूचना के अधिकार कानून के मूल उद्देश्यों को आघात पहुंचाता है।
महाधिवक्ता और मुख्य सचिव से लिखित स्पष्टीकरण मांगा
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को बेहद संजीदगी से लेते हुए राज्य के प्रशासनिक प्रमुख यानी मुख्य सचिव और सरकार के मुख्य कानूनी सलाहकार यानी महाधिवक्ता को नोटिस जारी किया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि अगली नियत तिथि पर यदि सरकार यह साबित करने में नाकाम रहती है कि लोकायुक्त को किस कानून के तहत यह रियायत दी गई थी, तो वर्ष 2011 की उस विवादित सरकारी अधिसूचना को तत्काल प्रभाव से खारिज कर दिया जाएगा। अदालत के इस रुख से साफ है कि वह प्रशासनिक मनमर्जी और अपारदर्शिता को कतई बर्दाश्त करने के पक्ष में नहीं है।
सरकारी वकीलों की उदासीनता पर बरसे न्यायाधीश
इस महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब अदालत कक्ष में प्रदेश सरकार का पक्ष रखने के लिए कोई भी पैरोकार मौजूद नहीं था। इस लापरवाही पर खंडपीठ ने गहरा क्षोभ व्यक्त किया। जब दोबारा बुलावा भेजे जाने पर शासन के एक वकील उपस्थित हुए, तो वे मामले के बुनियादी तथ्यों से भी पूरी तरह अनजान थे।
इस पर नाराजगी जताते हुए न्यायाधीशों ने कहा कि यह अब रोज का ढर्रा बन चुका है। राज्य सरकार के नुमाइंदे मुकदमों की सूची में नाम होने के बाद भी नदारद रहते हैं और आने पर अज्ञानता का रोना रोते हैं। अदालत ने इस गैर-जिम्मेदाराना रवैये को पूरी तरह अस्वीकार्य बताते हुए राज्य के विधि सचिव और मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वे सरकारी वकीलों के इस पूरे समूह की उपयोगिता और उनके कामकाज की नए सिरे से समीक्षा करें।
उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देना पड़ा भारी
यह पूरा मामला तब शुरू हुआ था जब मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने लोकायुक्त संगठन को एक आवेदक को तीस दिनों के भीतर मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने का आदेश दिया था। उच्च न्यायालय ने सूचना न देने पर पांच हजार रुपये का आर्थिक दंड भी लगाया था। राज्य सरकार ने अपनी पुरानी अधिसूचना की आड़ लेकर इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन अब पासा पूरी तरह उलट चुका है और सरकार की वह अधिसूचना खुद ही कानून के कठघरे में आकर खड़ी हो गई है।
उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय ने हाल ही में लोकायुक्त पुलिस को अपनी हर प्राथमिकी को चौबीस घंटे के भीतर अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक करने का आदेश भी दिया था, जो इस जांच एजेंसी के भीतर कामकाज की शुचिता और खुलापन लाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।