मानपुर जुआ कांड में आईएएस के बयान नहीं लेने पर हाई कोर्ट नाराज थाना प्रभारी का आरोप, आईएएस का नाम दर्ज न करने का दबाव डाला

    इंदौर। मानपुर स्थित एक महिला आईएएस अधिकारी के फार्म हाउस पर पकड़े गए जुआ मामले में हाई कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने साफ तौर पर पूछा कि जब मामला इतना गंभीर है, तो संबंधित आईएएस अधिकारी के बयान अब तक क्यों दर्ज नहीं किए गए। साथ ही, थाना प्रभारी (टीआई) द्वारा लगाए गए दबाव के आरोपों को भी कोर्ट ने अत्यंत गंभीर माना।
    यह पूरा मामला 10-11 मार्च की दरम्यानी रात का है, जब मानपुर क्षेत्र में स्थित आईएएस वंदना वैद्य के फार्म हाउस पर पुलिस ने छापा मारकर जुआ खेलते लोगों को पकड़ा था। इस कार्रवाई के अगले ही दिन मानपुर के टीआई लोकेंद्र सिंह हिहोरे, एसआई मिथुन ओसारी और एएसआई रेशम गिरवाल को निलंबित कर दिया गया। हालांकि, बाद में विभागीय स्तर पर कुछ पुलिसकर्मियों को बहाल कर दिया गया, लेकिन टीआई हिहोरे ने अपने निलंबन को गलत बताते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की।

थाना प्रभारी के आरोप गंभीर
    अपनी याचिका में हिहोरे ने गंभीर आरोप लगाए कि जुआ पकड़ने के बाद उन पर वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से दबाव बनाया गया कि एफआईआर में आईएएस अधिकारी का नाम शामिल न किया जाए और घटनास्थल में भी बदलाव किया जाए। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने इन निर्देशों का पालन करने से इनकार किया, तो उन्हें तत्काल सस्पेंड कर दिया गया। इतना ही नहीं, याचिका दायर करने के बाद उनका तबादला भी कर दिया गया, जिसे उन्होंने प्रताड़ना का हिस्सा बताया।

पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल
    मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए। कोर्ट ने कहा कि यदि घटना आईएएस अधिकारी के फार्म हाउस पर हुई है, तो उनके बयान लेना जांच का अहम हिस्सा होना चाहिए था, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी संकेत दिए कि जांच को प्रभावित करने के किसी भी प्रयास को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

दबाव के आरोपों की जांच हो
    हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस विभाग को निर्देश दिए हैं कि मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच सुनिश्चित की जाए। साथ ही, यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए दबाव के आरोपों की स्वतंत्र रूप से जांच होनी चाहिए। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों से विस्तृत जवाब भी मांगा है और अगली सुनवाई में प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। इस मामले ने न केवल पुलिस कार्रवाई की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि प्रशासनिक और राजनीतिक दबाव की संभावनाओं को लेकर भी गंभीर बहस छेड़ दी है।

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