जबलपुर। मध्य प्रदेश के बहुचर्चित 27% पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण प्रकरण पर जबलपुर स्थित उच्च न्यायालय की विशेष पीठ के समक्ष महत्वपूर्ण सुनवाई पूरी हुई। न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ के समक्ष प्रस्तुत इस मामले में न्यायिक चर्चा एक अत्यंत निर्णायक दिशा में मुड़ गई।
पिछड़ा वर्ग पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता विनायक प्रसाद शाह ने उच्चतम न्यायालय द्वारा इंदिरा साहनी प्रकरण में निर्धारित 50% आरक्षण सीमा पर प्रश्न चिन्ह खड़ा किया। उन्होंने न्यायालय के समक्ष तर्क दिया कि कोई भी पूर्व फैसला स्वयं में संविधान नहीं होता। न्यायपालिका का दायित्व संविधान और विधियों की व्याख्या करना है, न कि नए नियमों का निर्माण करना।
प्राचीन धर्मग्रंथों का संदर्भ और आबादी के अनुसार भागीदारी की मांग
अदालत में प्रस्तुत तर्कों के दौरान ऋग्वेद और मानव धर्मशास्त्र जैसे प्राचीन ग्रंथों का उल्लेख करते हुए भारतीय सामाजिक संरचना और जाति व्यवस्था के ऐतिहासिक संदर्भ दिए गए। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि आरक्षण प्रणाली की मूल भावना समाज से विषमता को समाप्त करना और शासन-प्रशासन के सभी क्षेत्रों में प्रत्येक वर्ग का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। इस दृष्टिकोण से अदालत को पूर्व में दी गई न्यायिक टिप्पणियों पर निर्भर रहने के बजाय संविधान के मूल अनुच्छेदों के प्रकाश में निर्णय पारित करना चाहिए। मामले में अनारक्षित वर्ग का पक्ष पूरा हो चुका है, जबकि पिछड़ा वर्ग अपनी जनसंख्या के अनुपात में पूर्ण भागीदारी की मांग पर दृढ़ है। इस विषय पर उच्च न्यायालय में आगे की सुनवाई जारी रहेगी।
प्रतिनिधित्व का मानक केवल जनसंख्या, पिछड़ा वर्ग पक्ष का प्रश्न
सुनवाई के दौरान पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधियों ने 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा और मात्रात्मक आंकड़ों (क्वांटिफिएबल डेटा) की अनिवार्यता से जुड़े सिद्धांतों पर सवाल उठाए। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि देश के संवैधानिक ढांचे में राष्ट्रपति चुनाव, संसद के दोनों सदनों, राज्य विधानसभाओं, स्थानीय निकायों और अनुसूचित जाति तथा जनजाति के प्रतिनिधित्व का मुख्य आधार केवल आबादी ही है। जब देश की पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रतिनिधित्व का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर होता है, तो पिछड़े वर्गों के लिए अलग मापदंड और सीमाएं क्यों लागू की जानी चाहिए?