प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि अब समय आ गया है जब वरिष्ठ अधिकारियों को उनके अधीनस्थ कर्मचारियों की गंभीर चूक और गैरकानूनी गतिविधियों के लिए भी जिम्मेदार ठहराया जाए। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने मुख्यमंत्री से अपेक्षा जताई है कि शासन व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ‘उच्च जिम्मेदारी’ का सिद्धांत लागू किया जाए।
यह टिप्पणी बरेली निवासी व्यवसायी अवनीश कुमार अग्रवाल की याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई। न्यायालय ने विशेष न्यायाधीश के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें दो प्राथमिकी लंबित होने के आधार पर पासपोर्ट के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी करने से इनकार किया गया था। अदालत ने संबंधित प्राधिकरण को याचक के पक्ष में अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी करने तथा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार पासपोर्ट जारी अथवा नवीनीकृत करने का निर्देश दिया।
आदेश की प्रति मुख्यमंत्री को दें
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने मुख्य सचिव को आदेश की प्रति सीधे मुख्यमंत्री के समक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश भी दिए। राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि याचक के विरुद्ध लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं, लेकिन अदालत ने मामले से जुड़े कई पहलुओं पर सवाल खड़े किए। पीठ ने वर्ष 2023 में दिए गए मनीष कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले के आदेश का उल्लेख किया। उस आदेश में राज्य सरकार को भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी से संबंधित प्राथमिकी की निगरानी के लिए उच्च स्तरीय समिति गठित करने तथा सरकारी विभागों द्वारा दर्ज मामलों की जांच समयबद्ध तरीके से पूरी कराने के निर्देश दिए गए थे।
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि 29 नवंबर 2023 के आदेश के अनुपालन में 9 दिसंबर 2025 को उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया। इस समिति की अध्यक्षता मुख्य सचिव कर रहे हैं। इसके अलावा गृह विभाग, विधि विभाग, पुलिस तथा अभियोजन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इसके सदस्य हैं। मंडल और जिला स्तर पर भी समितियां गठित की गई हैं। हालांकि, न्यायालय ने पाया कि पूर्व आदेशों का पालन विलंब से और आंशिक रूप से किया गया। अदालत ने कहा कि उसके पास मुख्य सचिव को तलब करने, व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने, आर्थिक दंड लगाने तथा प्रतिकूल टिप्पणियां दर्ज कर संबंधित प्राधिकरण को भेजने जैसे अधिकार उपलब्ध हैं, लेकिन राज्य और उसकी संस्थाओं के हित को देखते हुए फिलहाल ऐसे कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।
‘जिम्मेदारी का सिद्धांत’ लागू हो
अदालत ने भरोसा जताया कि वरिष्ठ अधिकारी स्वयं प्रभावी व्यवस्था विकसित कर नीतियों और न्यायिक आदेशों का सही क्रियान्वयन सुनिश्चित करेंगे। पीठ ने कहा कि जिस प्रकार सेना में कमान की जिम्मेदारी का सिद्धांत लागू होता है, उसी प्रकार विभागीय सचिवों, विभागाध्यक्षों और शीर्ष अधिकारियों को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके अधीन क्या गतिविधियां चल रही हैं। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि यदि कोई वरिष्ठ अधिकारी अपने अधीनस्थों द्वारा किए गए भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, अभिलेख दबाने अथवा सरकारी आदेशों की अवहेलना जैसी गतिविधियों को रोकने या दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई करने में विफल रहता है, तो उसकी जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी विफलताओं के लिए आपराधिक जवाबदेही पर भी विचार किया जाना चाहिए।
दो तरह के भ्रष्टाचार चलन में
पीठ ने संस्थागत पतन के दो प्रमुख रूपों के प्रति भी चेताया। पहला, मानसिक भ्रष्टाचार, जिसमें निजी हितों की पूर्ति के लिए निर्णय प्रक्रिया को जानबूझकर प्रभावित किया जाता है। दूसरा, आर्थिक भ्रष्टाचार, जिसमें सार्वजनिक पद का उपयोग व्यक्तिगत लाभ अर्जित करने के साधन के रूप में किया जाता है। याचक की ओर से अदालत को बताया गया कि एक प्राथमिकी की जांच लगभग 20 वर्षों से लंबित है, जबकि दूसरी प्राथमिकी में 18 वर्ष बाद वर्ष 2024 में आरोप पत्र प्रस्तुत किया गया। साथ ही, उच्च न्यायालय की एक समन्वय पीठ पहले ही उनके विरुद्ध चल रही कार्यवाही पर रोक लगा चुकी है।
बड़े अधिकारियों की जिम्मेदारी की समीक्षा
मामले के अनुसार, अवनीश कुमार अग्रवाल के विरुद्ध करीब 18 वर्ष पूर्व बिजनौर जिले के नजीबाबाद और मंडावली थानों में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। उन पर वाणिज्य कर विभाग के अधिकारियों के साथ मिलकर दस्तावेज जलवाने का आरोप लगाया गया था। अब उच्च न्यायालय के आदेश के बाद उनके पासपोर्ट संबंधी प्रकरण में राहत का मार्ग प्रशस्त हो गया है। इस फैसले के साथ न्यायालय ने शासन और प्रशासन में जवाबदेही की आवश्यकता पर जोर देते हुए स्पष्ट संकेत दिया है कि केवल अधीनस्थ कर्मचारियों