नई दिल्ली। साइबर धोखाधड़ी और डिजिटल गिरफ्तारी के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) को 4 सप्ताह के भीतर अवैध और साइबर अपराध से जुड़े बैंक खातों, जिनमें म्यूल अकाउंट भी शामिल हैं, से निपटने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार कर जारी करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि यह एसओपी सभी उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल को भी उपलब्ध कराई जाए।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बाग्ची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने डिजिटल गिरफ्तारी से जुड़े मामलों में स्वत: संज्ञान के तहत सुनवाई करते हुए भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (आई4सी) की स्थिति रिपोर्ट पर विचार किया। अदालत ने पाया कि डिजिटल गिरफ्तारी पर नियंत्रण की दिशा में प्रगति हुई है, लेकिन लगातार निगरानी बनाए रखना आवश्यक है।
धोखाधड़ी से आर्थिक नुकसान में कमी
सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई को बैंकों में शिकायत निवारण और ठगी की राशि वापस दिलाने की व्यवस्था लागू कराने के निर्देश दिए। साथ ही अंतर-विभागीय समिति से साझा जवाबदेही और पीड़ितों को मुआवजा देने की व्यवस्था पर भी विचार करने को कहा। आई4सी की रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर डिजिटल गिरफ्तारी से जुड़ी शिकायतें वर्ष 2024 में 123672 थीं, जो 2025 में घटकर 58249 रह गईं। वहीं 30 जून 2026 तक यह संख्या 16377 दर्ज की गई। धोखाधड़ी से होने वाले आर्थिक नुकसान में भी उल्लेखनीय कमी आई है।
80 करोड़ रुपये के लेनदेन का खुलासा हुआ
अदालत ने यह भी बताया कि सीबीआई ने डिजिटल गिरफ्तारी से जुड़े 10 मामले और कई अन्य संबंधित प्रकरण दर्ज किए हैं। जांच में 238 पीड़ितों की पहचान हुई, 67 प्रथम-स्तरीय बैंक खातों का पता चला, लगभग 80 करोड़ रुपये के लेनदेन का खुलासा हुआ तथा 16 राज्यों के 93 स्थानों पर तलाशी अभियान चलाया गया। अदालत ने उस सुझाव पर भी ध्यान दिया जिसमें संगठित नेटवर्क से जुड़े मामलों को एक साथ जोड़कर सीबीआई के अधिकार क्षेत्र की वर्तमान 10 करोड़ रुपये की सीमा पर पुनर्विचार की बात कही गई है।
मॉड्यूल शीघ्र लागू करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को शिकायत निवारण मॉड्यूल तथा धन वापसी मॉड्यूल शीघ्र लागू करने का निर्देश दिया। राज्यों से डिजिटल गिरफ्तारी और साइबर ठगी के प्रति व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाने को भी कहा गया है।
सभी उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिए गए हैं कि वे साइबर धोखाधड़ी के मामलों में बैंक खाते फ्रीज होने से संबंधित न्यायालयों और प्राधिकृत अधिकारियों को उपलब्ध शिकायत निवारण व्यवस्था की जानकारी दें, ताकि प्रभावित लोग अन्य कानूनी उपाय अपनाने से पहले इन व्यवस्थाओं का लाभ उठा सकें। हालांकि इससे उनके वैधानिक और संवैधानिक अधिकार प्रभावित नहीं होंगे।
फ्रीज किए बैंक खातों के मामलों का त्वरित निपटारा हो
अदालत ने जिन राज्यों में अब तक राज्य साइबर अपराध समन्वय केंद्र अधिसूचित नहीं हुए हैं, उन्हें 4 सप्ताह के भीतर यह प्रक्रिया पूरी करने और आई4सी के परामर्श से ई-जीरो एफआईआर व्यवस्था अपनाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही साइबर वित्तीय धोखाधड़ी के कारण फ्रीज किए गए बैंक खातों से जुड़े मामलों का त्वरित निपटारा सुनिश्चित करने को कहा है।
अंतर-विभागीय समिति को बैंकों और अन्य संबंधित संस्थाओं के साथ मिलकर ऐसे तकनीकी उपायों पर भी विचार करने के निर्देश दिए गए हैं, जिनसे डिजिटल गिरफ्तारी जैसी ठगी रोकी जा सके, पीड़ितों की धनराशि की वापसी आसान हो, जांच अधिक प्रभाव