वाहन की नंबर प्लेट ढकी तो सिर्फ चालान, धोखाधड़ी का केस नहीं, सुप्रीम कोर्ट का धारा 420 हटाने का निर्देश!

नई दिल्ली। वाहन की नंबर प्लेट को ढकना या छिपाना ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन तो है, लेकिन इसे धोखाधड़ी का आपराधिक मामला नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि नंबर प्लेट पर मास्क या कपड़ा लगाने मात्र से भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए यह व्यवस्था दी।

स्कूटी की पिछली नंबर प्लेट काले मास्क से ढकी मिली
यह मामला तेलंगाना का है, जहां एक व्यक्ति अपनी काले रंग की होंडा एक्टिवा स्कूटी की पिछली नंबर प्लेट को काले मास्क से ढककर चला रहा था। गश्त के दौरान पुलिस ने उसे रोका और इस आशंका के आधार पर एफआईआर दर्ज कर ली कि उसने चालान से बचने या पहचान छिपाने के उद्देश्य से ऐसा किया है। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ धारा 420 और मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 80(ए) के तहत चार्जशीट पेश की, जिस पर मजिस्ट्रेट ने संज्ञान ले लिया था। अपीलकर्ता ने इस एफआईआर को खत्म कराने के लिए तेलंगाना हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने मामले को प्रथम दृष्टया सही मानते हुए याचिका खारिज कर दी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया।

कोर्ट ने कहा कि यह धोखाधड़ी नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस का यह सोचना केवल एक अनुमान है कि नंबर प्लेट चालान से बचने के लिए छिपाई गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी का अपराध साबित करने के लिए तीन मुख्य तत्व आवश्यक हैं बेईमानी की नीयत, किसी को उकसाना और संपत्ति का हस्तांतरण या नुकसान। इस मामले में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने किसी को गलत तरीके से फायदा पहुँचाने या नुकसान पहुँचाने के लिए ऐसा किया। अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि वाहन की आगे की नंबर प्लेट पूरी तरह साफ दिख रही थी, जिससे यह साफ होता है कि पहचान छिपाने की कोई सोची-समझी साजिश नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसे एक रेगुलेटरी उल्लंघन करार दिया जो केवल मोटर व्हीकल एक्ट, 1988 के दायरे में आता है।

आपराधिक कार्यवाही रद्द करने का निर्देश
अदालत ने आरोपी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए रद्द कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह साफ किया कि मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 177 के तहत जो जुर्माना बनता है, उससे आरोपी बच नहीं सकता। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि जुर्माना पहले जमा नहीं किया गया है, तो अपीलकर्ता को 1 महीने के अंदर संबंधित अधिकारी के पास राशि जमा करनी होगी।

Leave a Comment