लखनऊ। उत्तर प्रदेश में आईएएस अधिकारियों के सेवा छोड़ने का सिलसिला अब महज व्यक्तिगत फैसलों की कहानी नहीं रह गया। 2013 बैच की आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल के इस्तीफे ने एक बार फिर इस सवाल को सामने ला दिया है कि देश की सबसे प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवा में आने वाले अधिकारी आखिर समय से पहले बाहर निकलने का रास्ता क्यों चुन रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में यूपी कैडर के 13 आईएएस अधिकारी सेवा से बाहर हो चुके हैं। इनमें 9 ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति यानी वीआरएस लिया, जबकि 5 अधिकारियों ने इस्तीफा दिया है। एक अधिकारी का इस्तीफा बाद में वापस हुआ। दिव्या मित्तल का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वे फील्ड में सक्रिय प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर पहचान बना चुकी थीं। मिर्जापुर, संत कबीर नगर और बस्ती की जिलाधिकारी रहते हुए उनकी कार्यशैली चर्चा में रही। आईआईटी दिल्ली और आईआईएम बेंगलुरु से पढ़ाई करने के बाद लंदन में नौकरी कर चुकी दिव्या ने करीब 13 वर्ष प्रशासनिक सेवा में बिताए। बाद में राजस्व विभाग में विशेष सचिव की जिम्मेदारी मिली। फील्ड से मंत्रालयी भूमिका में बदलाव के बाद उनकी सक्रिय कार्यशैली के अनुरूप अवसर सीमित हो गए। माना जा रहा है कि इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने सेवा छोड़ने का निर्णय लिया।
मंत्रालय की नौकरी रास नहीं आ रही
यही वह बिंदु है जहां यूपी की प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर बड़ा सवाल खड़ा होता है। आईएएस अधिकारी जिलों में निर्णय लेने, योजनाओं को जमीन पर उतारने और प्रशासनिक नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए तैयार किए जाते हैं। लेकिन, जब उनकी भूमिका लगातार सरकारी दफ्तरों तक सीमित होती जाती है या फैसलों में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ता है तो प्रशासनिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन बिगड़ने की शिकायतें सामने आती हैं।
राजनीतिक दखलंदाजी भी बड़ी वजह
प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा लंबे समय से है कि अधिकारी सेवा में आने के बाद एक सीमा तक राजनीतिक नेतृत्व के साथ तालमेल बनाकर चलते हैं, लेकिन जब उन्हें लगता है कि उनकी पेशेवर स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है तो कुछ अधिकारी विकल्प तलाशने लगते हैं। हालांकि, हर इस्तीफे या वीआरएस को राजनीतिक दबाव से जोड़ना सही नहीं होगा, क्योंकि अधिकारियों के व्यक्तिगत, पारिवारिक, स्वास्थ्य और करियर से जुड़े कारण भी होते हैं। फिर भी इतने कम समय में बड़ी संख्या में अधिकारियों का समय से पहले सेवा छोड़ना व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल जरूर पैदा करता है।
राजनीतिक नेतृत्व के अधीन होती जा रही यह सेवा
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यूपी जैसे विशाल राज्य में प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका धीरे-धीरे राजनीतिक नेतृत्व के अधीन होती जा रही है? लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित सरकार का प्रशासन पर नियंत्रण स्वाभाविक है, लेकिन प्रशासनिक तंत्र की पेशेवर स्वतंत्रता भी उतनी ही जरूरी है। यदि अधिकारी हर निर्णय में राजनीतिक स्वीकार्यता तलाशने को मजबूर हों तो प्रशासन की निष्पक्षता और दीर्घकालिक नीतिगत सोच प्रभावित हो सकती है। दूसरी तरफ अधिकारियों के समय से पहले सेवा छोड़ने का असर शासन की निरंतरता पर भी पड़ता है। एक आईएएस अधिकारी को तैयार करने में वर्षों लगते हैं। जिला प्रशासन से लेकर सचिवालय तक अनुभव हासिल करने के बाद जब कोई अधिकारी समय से पहले व्यवस्था से बाहर होता है तो सरकार को उसका अनुभव और संस्थागत स्मृति दोनों गंवाने पड़ते हैं।
प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर चल रहे बदलाव का संकेत
यूपी में आईएएस अधिकारियों के इस्तीफे और वीआरएस को इसलिए सिर्फ व्यक्तिगत फैसलों की श्रृंखला मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। अलग-अलग मामलों की वजह भले अलग हो, लेकिन एक साथ इतने अधिकारियों का सेवा से बाहर होना प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर चल रहे बदलाव का संकेत जरूर है। सवाल अब यह नहीं है कि कितने अफसर जा चुके हैं, बल्कि यह है कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां बन रही हैं जिनमें अनुभवी अधिकारी उस सेवा को छोड़ना बेहतर समझ रहे हैं, जिसे पाने के लिए देश के लाखों युवा हर साल कठिन परीक्षा देते हैं।