नई दिल्ली। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने मुहर्रम मेले के आयोजन को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने इंदौर नगर निगम की मेयर-इन-काउंसिल (एमआईसी) द्वारा मेले की मंजूरी को अचानक निरस्त करने वाले प्रस्ताव को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने मेले की अनुमति को फिर से बहाल करते हुए टिप्पणी की कि नगर निगम ने इस पूरे मामले में उचित प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया। यह पूरा विवाद मुहर्रम मेले के पारंपरिक आयोजन से जुड़ा हुआ है। इस मामले को लेकर ‘वक्फ कर्बला इंतजामिया कमेटी’ ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ता कमेटी ने अदालत के समक्ष पक्ष रखा कि वे हर साल शहर के धोबी घाट पर ताजिया जुलूस और मुहर्रम मेले का प्रबंधन करते आ रहे हैं, जिसके लिए नगर निगम समय-समय पर लिखित स्वीकृति देता रहा है।
इस साल भी नगर निगम ने 25 जून को एक ऑफिशियल ऑर्डर जारी कर 26 जून से 28 जून तक (तीन दिन) मेले के आयोजन की इजाजत दी थी। इसके बदले में कमेटी ने 1.36 लाख रुपए की तय फीस भी जमा कर दी थी। लेकिन इसी बीच, 25 जून की रात को ही एमआईसी ने अचानक एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाई और पूर्व में दी गई मंजूरी को वापस लेने का एकतरफा प्रस्ताव पास कर दिया। वक्फ कमेटी का आरोप था कि इस आकस्मिक फैसले से पहले न तो उन्हें कोई नोटिस दिया गया और न ही उनका पक्ष सुना गया।
अदालत में खारिज हुईं नगर निगम की दलीलें
सुनवाई के दौरान इंदौर नगर निगम ने मेले के आयोजन का विरोध करते हुए दलील दी कि साल 2024 के एक पुराने अदालती फैसले के मुताबिक, धोबी घाट की केवल 0.02 एकड़ जमीन का उपयोग पारंपरिक रूप से होता है, और वह भी मेले के लिए नहीं बल्कि सिर्फ ताजिया विसर्जन के लिए तय है। इसके साथ ही निगम ने यह आरोप भी मढ़ा कि पिछले साल कमेटी ने इवेंट की पूरी फीस जमा नहीं की थी और तय शर्तों का उल्लंघन किया था।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने नगर निगम के इन तर्कों को अमान्य कर दिया। कोर्ट ने रेखांकित किया कि नगर निगम ने 25 जून को जो अप्रूवल लेटर जारी किया था, उसमें पिछले साल की किसी शर्त के उल्लंघन या बकाया राशि का कोई उल्लेख नहीं था। निगम ऐसा कोई भी दस्तावेज पेश करने में असफल रहा जिससे यह साबित हो कि पिछली गलतियों पर कमेटी के खिलाफ कोई एक्शन लिया गया था। अदालत ने कहा कि मेले के लिए आवेदन 3 जून को ही दे दिया गया था, लेकिन निगम प्रशासन 25 जून तक बैठा रहा और फिर उसी रात बिना किसी पूर्व सूचना के मंजूरी वापस ले ली। कोर्ट ने साफ कहा कि इस संवेदनशील मामले को जिस तरह हैंडल किया गया, वह न्यायसंगत नहीं है।
इसी साल के लिए मान्य रहेगा आदेश, भविष्य के लिए गाइडलाइन जारी
हाई कोर्ट ने वक्फ कमेटी की याचिका को मंजूर करते हुए 25 जून के एमआईसी प्रस्ताव को तत्काल प्रभाव से शून्य घोषित कर दिया और सभी शर्तों के साथ मेले की परमिशन बहाल कर दी। हालांकि, अदालत ने यह साफ कर दिया है कि यह फैसला केवल इसी साल (2026) के मेले के लिए प्रभावी रहेगा। कोर्ट ने इस विशेष स्थान पर हर साल कार्यक्रम आयोजित करने के स्थायी अधिकार (परमानेंट राइट) के सवाल पर कोई टिप्पणी नहीं की है।
भविष्य में कानून-व्यवस्था या प्रशासनिक असमंजस की स्थिति को रोकने के लिए हाई कोर्ट ने एक सख्त गाइडलाइन भी जारी की है। निर्देश के अनुसार, अगले साल से आयोजन समिति को मेला शुरू होने से कम से कम ढाई महीने पहले अपना एप्लीकेशन नगर निगम में सबमिट करना होगा, और नगर निगम प्रशासन को मेला शुरू होने से कम से कम 30 दिन पहले उस आवेदन पर अपना अंतिम और स्पष्ट निर्णय (फाइनल डिसीजन) लेना होगा।