
इंदौर। मध्य प्रदेश में अवैध खनन, परिवहन और भंडारण के मामलों में वसूले जा रहे भारी-भरकम जुर्माने को लेकर एक बड़ा कानूनी विवाद सामने आया। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने इस संबंध में दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य शासन को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत भी दी है और उनके जब्त वाहन को कुछ शर्तों के साथ रिहा करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ल और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने ‘विकास कुमार प्रधान बनाम मध्य प्रदेश शासन एवं अन्य’ मामले में यह आदेश दिया। इस याचिका में मध्य प्रदेश खनिज (अवैध खनन, परिवहन एवं भंडारण की रोकथाम) नियम, 2022 के नियम-18 को चुनौती दी गई। अदालत ने पहली नजर में माना कि याचिका में उठाए गए बिंदु बेहद गंभीर हैं और इन पर विस्तार से विचार करने की आवश्यकता है।
जुर्माने की अधिकतम सीमा का उल्लंघन
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील जयेश गुरनानी ने कोर्ट के सामने एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु रखा। उन्होंने बताया कि नियम-18 के तहत जो भारी आर्थिक दंड लगाया जा रहा है, वह केंद्र सरकार के मूल कानून ‘माइन्स एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट, 1957’ की धारा 21(2) का उल्लंघन करता है। केंद्रीय अधिनियम की इस धारा के तहत किसी भी मामले में अधिकतम जुर्माना केवल 5 लाख रुपये तक ही सीमित हो सकता है। इसके उलट, राज्य सरकार के नियम-18 का सहारा लेकर अधिकारी कई मामलों में इस सीमा से कहीं ज्यादा यानी करोड़ों रुपये की वसूली कर रहे हैं। याचिका में तर्क दिया गया कि कोई भी राज्य सरकार अपने नियमों के जरिए संसद द्वारा बनाए गए मूल कानून की तय सीमा को पार नहीं कर सकती।
वाहन की कीमत ही 20 लाख
इस विशेष मामले में याचिकाकर्ता के वाहन पर 5 लाख 22 हजार रुपए का जुर्माना ठोक कर उसे जब्त कर लिया था। कोर्ट को बताया गया कि जब्त गाड़ी की कीमत करीब 20 लाख रुपए है। व्यावसायिक वाहन होने के कारण उसके बंद पड़े रहने से मालिक को हर दिन बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। दूसरी तरफ, राज्य सरकार के वकीलों ने आपत्ति जताई कि याचिकाकर्ता को सीधे हाई कोर्ट आने के बजाय नियमों के तहत उपलब्ध अपील के विकल्प का इस्तेमाल करना चाहिए था।
याचिकाकर्ता को अदालत से राहत
हालांकि, अदालत ने इस आपत्ति को खारिज करते हुए कहा कि जब सीधे नियम की वैधता को ही चुनौती दी गई हो, तो अपील का दूसरा जरिया आड़े नहीं आता। हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को राहत देते हुए आदेश दिया कि 3 लाख रुपए जमा करने और वाहन की कीमत के बराबर की गारंटी (सिक्योरिटी) देने पर गाड़ी को छोड़ दिया जाए। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यह रिहाई और जमा की गई रकम इस याचिका के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगी। जानकारों का मानना है कि अगर आगे चलकर हाई कोर्ट ने नियम-18 को केंद्रीय कानून के खिलाफ पाया, तो पूरे मध्य प्रदेश में इस नियम के तहत की गई करोड़ों रुपये की दंडात्मक वसूली पर इसका बड़ा असर पड़ेगा।