राष्ट्रपति की की मंजूरी के बाद महाराष्ट्र का धर्मांतरण-विरोधी कानून की राह साफ, नोटिफिकेशन के बाद प्रभावी होगा अधिनियम!

मुंबई। महाराष्ट्र में धर्मांतरण-विरोधी कानून लागू होने की दिशा में अहम कदम पूरा हो गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 को मंजूरी दे दी है। राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के साथ ही विधायी प्रक्रिया पूरी हो गई है। अब यह कानून तभी प्रभावी होगा, जब राज्य सरकार इसकी लागू होने की तिथि घोषित करते हुए आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी करेगी।
महाराष्ट्र धर्म की स्वतंत्रता विधेयक, 2026 को राज्य विधानसभा के बजट सत्र के दौरान पेश किया गया था। इसे 13 मार्च, 2026 को विधानसभा में प्रस्तुत किया गया और 16 मार्च को सदन ने पारित कर दिया। इसके अगले दिन 17 मार्च को विधान परिषद ने भी विधेयक को मंजूरी दे दी। दोनों सदनों से पारित होने के बाद इसे राज्यपाल सी.पी. राधाकृष्णन के पास भेजा गया। राज्यपाल ने विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखते हुए आगे भेज दिया था।

31 जुलाई को इस विधेयक को मंजूरी
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 31 जुलाई, 2026 को इस विधेयक को अपनी मंजूरी प्रदान कर दी। इसके बाद राज्यपाल ने अधिनियम को अधिसूचना जारी करने की प्रक्रिया के लिए राज्य सरकार को भेज दिया। अब सरकार की ओर से नोटिफिकेशन जारी होने के बाद ही यह कानून पूरे राज्य में लागू माना जाएगा।
इस अधिनियम के कई प्रावधान पहले से विवाद का विषय बने हुए हैं। इनमें धर्म परिवर्तन से पहले अनिवार्य घोषणा, तीसरे पक्ष द्वारा शिकायत दर्ज कराने की अनुमति तथा सबूत का बोझ आरोपी पर डालने जैसे प्रावधान शामिल हैं। ऐसे ही प्रावधानों वाले अन्य राज्यों के कानूनों को लेकर दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई लंबित है।

देश का 13वां राज्य बन गया
महाराष्ट्र इस तरह का कानून लागू करने वाला देश का 13वां राज्य बन गया है। जिन राज्यों में ऐसे कानून लागू हैं, वहां भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं। इन कानूनों को लेकर पहले से ही संवैधानिक वैधता पर न्यायिक परीक्षण जारी है। विधेयक को विधानसभा में जिस तेजी से पारित किया गया, उसे लेकर भी सवाल उठे हैं। नागरिक संगठन ‘सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस’ (सीजेपी) ने अपनी असहमति दर्ज कराते हुए कहा कि विधेयक को कुछ ही दिनों के भीतर पेश कर पारित कर दिया गया।
संगठन का कहना है कि इस दौरान न तो व्यापक जन-परामर्श की प्रक्रिया अपनाई गई और न ही पर्याप्त विधायी परीक्षण किया गया। सीजेपी ने यह भी कहा कि जब अन्य राज्यों के समान कानून पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती का सामना कर रहे हैं, तब ऐसे विधेयक को जल्दबाजी में पारित करना उचित नहीं था।

मामलों की सुनवाई अभी सुप्रीम कोर्ट में
सीजेपी वर्ष 2020 से 2023 के बीच पांच राज्यों में बनाए गए धर्मांतरण-विरोधी कानूनों के खिलाफ दायर संवैधानिक याचिकाओं में प्रमुख याचिकाकर्ता है। इन मामलों की सुनवाई अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। संगठन ने कानूनों के कठोर प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाने की मांग भी की है, जिस पर पिछले पांच वर्षों से अधिक समय से निर्णय का इंतजार किया जा रहा है।

Leave a Comment