बर्फ और चट्टानों के भारी मलबे से पैदा हुआ भूकंप, फिर भूस्खलन से बना बांध टूटा तो आई दूसरी बाढ़
काठमांडू। नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ को लेकर अब तक सामने आ रही वजहों पर नई जानकारी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। शुरुआती तौर पर माना जा रहा था कि तिब्बत में किसी ग्लेशियर झील के अचानक फटने से नेपाल की घाटियों में तबाही मची। बाद में यह आशंका भी जताई गई कि भूकंप के कारण बर्फ और चट्टानों के खिसकने से बाढ़ आई। लेकिन नेपाल सेंटर फॉर डिजास्टर मैनेजमेंट के अध्यक्ष विशाल नाथ उप्रेती के मुताबिक, उपलब्ध जानकारी इन दोनों धारणाओं से अलग तस्वीर सामने रखती है।
उप्रेती ने बताया कि नेपाल और तिब्बत में अचानक आई इस बाढ़ की घटना करीब 5-6 दिन पहले हुई थी। शुरुआती जांच के दौरान इसे ग्लेशियर झील फटने से आई बाढ़ माना गया था। ऐसी स्थिति में पहाड़ों के बीच जमा झील का पानी अचानक बाहर निकलता है और बेहद तेज रफ्तार से नीचे की ओर बहते हुए भारी तबाही मचा सकता है। हालांकि, बाद में जांच में यह बात सामने आई कि तिब्बत में ऐसी कोई झील नहीं फटी थी। इसके बाद ग्लेशियर झील फटने वाली आशंका को खारिज कर दिया गया।
भूकंप को लेकर भी बदली तस्वीर
इसके बाद यह संभावना सामने आई कि कहीं भूकंप के कारण बर्फ और चट्टानों का बड़ा हिस्सा पहाड़ से नीचे तो नहीं गिरा। इस घटनाक्रम को लेकर अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण ने जो जानकारी दी, उसने पूरी तस्वीर ही बदल दी। उपलब्ध निष्कर्षों के अनुसार बाढ़ भूकंप के कारण नहीं आई थी। बल्कि घाटी में भारी मात्रा में बर्फ और चट्टानों के गिरने से ही भूकंपीय हलचल पैदा हुई थी।
शुरुआत में इस भूकंप की तीव्रता 4.2 बताई गई थी, लेकिन बाद में इसे संशोधित कर 5.2 किया गया। यानी घटनाक्रम का क्रम उलटा था। पहले बर्फ और चट्टानों का बड़ा हिस्सा नीचे गिरा, उससे भूकंपीय हलचल पैदा हुई और इसके बाद क्षेत्र में मलबे तथा पानी के बहाव की स्थिति बनी। इस तथ्य ने नेपाल में आई बाढ़ को लेकर अब तक चली आ रही धारणाओं को बदल दिया है।
तीन घंटे बाद फिर हुआ भूस्खलन
विशाल नाथ उप्रेती के अनुसार, पहली घटना के करीब 3 घंटे 8 मिनट बाद एक और बड़ा भूस्खलन हुआ। इस भूस्खलन के कारण मलबे का एक बांध जैसा अवरोध बन गया। बाद में यह अवरोध टूट गया और पानी का एक और छोटा बहाव नीचे की ओर आया। हालांकि इस बार पानी अपेक्षाकृत धीमी गति से आगे बढ़ा, इसलिए पहली घटना जैसी बड़ी तबाही नहीं हुई।
उप्रेती ने इस घटना की तुलना उत्तराखंड के चमोली में हुई आपदा से भी की। वहां करीब 2 किलोमीटर की ऊंचाई से बर्फ और चट्टानों का बड़ा हिस्सा नीचे आया था। इसके बाद भारी मात्रा में मलबा बहा और बड़े पैमाने पर तबाही हुई थी। उस घटना में करीब 200 लोगों की मौत हुई थी। नेपाल की मौजूदा त्रासदी में हालांकि नुकसान का पैमाना कहीं ज्यादा बड़ा होने की आशंका जताई जा रही है।
आंकड़ा बढ़ने की आशंका
उप्रेती ने कहा कि नेपाल में इस आपदा के बाद 5,000 से अधिक लोगों के मारे जाने या लापता होने की खबर है। उनका अनुमान है कि राहत और खोज अभियान आगे बढ़ने के साथ यह संख्या 7,000 या 10,000 तक भी पहुंच सकती है। अचानक आई बाढ़ ने बड़ी संख्या में लोगों को बेघर कर दिया है और कई इलाकों में जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। नेपाल में आई इस आपदा का असर विदेशी नागरिकों पर भी पड़ा है। जानकारी के मुताबिक 39 देशों के करीब 590 विदेशी नागरिक अब भी लापता बताए जा रहे हैं। लापता लोगों की तलाश और आपदा से प्रभावित इलाकों में राहत का काम लगातार चुनौती बना हुआ है।
सैटेलाइट तस्वीरों से जुटाई जा रही जानकारी
उप्रेती के मुताबिक इस पूरी घटना की असली वजह जानने में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अब तक वैज्ञानिक उस स्थान तक नहीं पहुंच सके हैं, जहां से बर्फ और चट्टानों के खिसकने की शुरुआत हुई। ऐसे में मौजूदा अध्ययन मुख्य रूप से उपग्रह से मिली तस्वीरों और उपलब्ध सूचनाओं पर आधारित है। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक अभी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर पहाड़ से इतनी बड़ी मात्रा में बर्फ और चट्टानें एक साथ कैसे नीचे आईं। एक संभावना यह भी सामने आई है कि यह बहुत बड़ा चट्टानी भूस्खलन था, जिसमें बर्फ चट्टानों के ऊपर मौजूद थी। यानी संभव है कि पूरा ग्लेशियर ही नीचे नहीं खिसका हो, बल्कि चट्टानों के खिसकने के साथ उनके ऊपर जमा बर्फ भी नीचे आ गई हो।
वैज्ञानिक अभी अंतिम निष्कर्ष से दूर
विशाल नाथ उप्रेती ने साफ किया कि यह अभी शुरुआती वैज्ञानिक आकलन है और इसकी अंतिम पुष्टि नहीं हुई है। घटनास्थल तक पहुंचकर प्रत्यक्ष जांच होने के बाद ही आपदा की वास्तविक प्रक्रिया को पूरी तरह समझा जा सकेगा। नेपाल की इस त्रासदी ने हिमालयी क्षेत्रों में अचानक होने वाली प्राकृतिक घटनाओं को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। इस
[01-09-2026 09:39 AM] Hemant Pal: घटना में ग्लेशियर झील फटने की आशंका से लेकर भूकंप और बड़े पैमाने पर बर्फ-चट्टान गिरने तक कई संभावनाएं सामने आईं। अब तक मिली जानकारी यह संकेत देती है कि इस बार तबाही की शुरुआत पानी से नहीं, बल्कि पहाड़ से टूटकर नीचे आए बर्फ और चट्टानों के विशाल मलबे से हुई हो सकती है।