कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने इस बार केवल राजनीतिक बदलाव की कहानी नहीं लिखी, बल्कि समाज के उस तबके की आवाज़ भी सामने लाई है, जिसे अक्सर सत्ता और व्यवस्था से दूर माना जाता रहा है। गुस्कारा विधानसभा क्षेत्र से जीत दर्ज करने वाली भाजपा की नई विधायक कलिता मांझी आज पूरे राज्य में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। वजह केवल उनकी जीत नहीं, बल्कि वह संघर्ष है जिसने उन्हें घरेलू नौकरानी से विधानसभा तक पहुंचाया।
कलिता मांझी का जीवन लंबे समय तक आर्थिक तंगी और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच बीता। वर्ष 2006 में एक प्लंबर से विवाह के बाद वे गुस्कारा इलाके में दो घरों में घरेलू काम कर परिवार चलाती थीं। बर्तन धोना, कपड़े साफ करना और घरों की सफाई कर वे हर महीने लगभग साढ़े चार हजार रुपये कमाती थीं। इसी छोटी आय में बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी होती थीं।
परिवार की जिम्मेदारियों के बीच भी उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों से खुद को अलग नहीं किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों और योजनाओं से प्रभावित होकर वे भाजपा की बैठकों और रैलियों में लगातार शामिल होती रहीं। धीरे-धीरे इलाके में उनकी पहचान एक मेहनती और लोगों के बीच रहने वाली महिला कार्यकर्ता के रूप में बनने लगी।
स्थानीय स्तर पर लोगों की समस्याओं को लेकर सक्रिय रहने वाली कलिता ने कई सामाजिक मुद्दों पर आवाज उठाई। अभय कांड के विरोध में भी उन्होंने खुलकर हिस्सा लिया था। नगर निकाय और मोहल्लों में काम करते हुए उन्होंने खासकर महिलाओं और गरीब परिवारों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। यही कारण रहा कि चुनाव में आम लोगों ने उन पर भरोसा जताया।
गुस्कारा सीट पर भाजपा प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरी कलिता मांझी ने अपने प्रतिद्वंद्वी श्यामा प्रसन्ना लोहार को 12 हजार 535 मतों के अंतर से हराया। उन्हें कुल 1 लाख 7 हजार 692 वोट मिले। यह जीत केवल एक उम्मीदवार की सफलता नहीं मानी जा रही, बल्कि भाजपा की उस रणनीति की मिसाल बन गई है जिसमें जमीनी स्तर पर काम करने वाले चेहरों को आगे बढ़ाया गया।
चुनाव जीतने के बाद भी कलिता मांझी की जिंदगी में कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं दिया। सोमवार देर रात जब वे घर लौटीं तो न कोई भव्य आयोजन था और न ही किसी तरह का दिखावा। थकी हुई कलिता ने घर पहुंचकर अपनी सास के हाथों से बना आलू-पटोलर और झोल खाया। अगले ही दिन वे सामान्य दिनों की तरह घर के कामों में जुट गईं। कपड़े धोना और घरेलू जिम्मेदारियां निभाना उन्होंने नहीं छोड़ा।
साड़ी नहीं होने की बात की, तो मालिक ने गिफ्ट की
उनकी सादगी उस समय और अधिक चर्चा में आ गई जब उन्होंने बताया कि कोलकाता में होने वाले शपथ ग्रहण समारोह में जाने के लिए उनके पास पहनने योग्य कोई अच्छी साड़ी नहीं है। उन्होंने इच्छा जताई कि वे अपने पति और बेटे को भी समारोह में साथ ले जाना चाहती हैं, लेकिन आर्थिक स्थिति अब भी सीमित है। उनकी यह बात सामने आने के बाद जिन घरों में वे काम करती थीं, उनमें से एक परिवार के सदस्य कृष्णा पात्रा ने उन्हें साड़ी भेंट करने का निर्णय लिया।
संघर्ष करने वाली महिलाओं के लिए काम करेंगी
कलिता मांझी का कहना है कि विधायक बनने के बाद भी वे गरीबों और मेहनतकश महिलाओं की समस्याओं को नहीं भूलेंगी। उन्होंने कहा कि वे खासतौर पर उन महिलाओं के लिए काम करना चाहती हैं जो उनकी तरह संघर्षपूर्ण जीवन जी रही हैं। उनका मानना है कि गरीबी किसी इंसान की क्षमता तय नहीं करती, अवसर मिलने पर कोई भी व्यक्ति समाज में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
ये है सामाजिक बदलाव का इशारा
पश्चिम बंगाल की राजनीति में कलिता मांझी की यह जीत केवल सत्ता परिवर्तन की घटना नहीं, बल्कि उस सामाजिक बदलाव का संकेत भी मानी जा रही है जिसमें साधारण परिवारों से आने वाले लोग अब नेतृत्व की भूमिका में दिखाई दे रहे हैं। उनकी कहानी आज उन हजारों महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही है जो सीमित साधनों के बावजूद अपने सपनों को जिंदा रखती हैं।