नई दिल्ली। अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग में ‘क्रीमी लेयर’ लागू करने की मांग को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया। सरकार का कहना है कि एससी और एसटी समुदायों को आरक्षण केवल आर्थिक आधार पर नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक, सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को ध्यान में रखकर दिया गया है। इन वर्गों के साथ होने वाला जातिगत भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार सिर्फ आय या बेहतर आर्थिक स्थिति होने से समाप्त नहीं हो जाता, इसलिए अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की तर्ज पर एससी और एसटी में क्रीमी लेयर का दायरा लागू नहीं किया जा सकता।
याचिकाकर्ताओं का तर्क और समानता का सवाल
सुप्रीम कोर्ट में यह मामला रमाशंकर प्रजापति और अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि एससी और एसटी वर्ग के जिन लोगों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति सुधर चुकी है, उन्हें आरक्षण के लाभ से बाहर किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि ऐसा न करने से संविधान में दिए गए समानता के अधिकार और अन्य मूल अधिकारों का उल्लंघन होता है। अदालत ने इस पर संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा था, जिसके बाद सरकार ने अपना पक्ष प्रस्तुत किया।
संसद के पास ही बदलाव का अधिकार
केंद्र सरकार ने अपने जवाब में यह बात भी रेखांकित की कि एससी और एसटी की संवैधानिक सूची में किसी भी प्रकार का संशोधन करने का अधिकार केवल संसद के पास है। राज्य सरकारें, अदालतें या कोई अन्य प्राधिकरण इस सूची में फेरबदल नहीं कर सकते। सरकार के मुताबिक न्यायिक आदेश के जरिए आरक्षण की मूल संरचना में बदलाव की मांग संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। ओबीसी वर्ग में संपन्न तबके को क्रीमी लेयर के तहत आरक्षण का लाभ नहीं मिलता, लेकिन एससी और एसटी के मामले में स्थिति पूरी तरह अलग है।