नई दिल्ली। ईरान युद्ध के चलते वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आई उथल-पुथल अब कुछ कम होती दिखाई दे रही है, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार के सामने एक नया जोखिम उभर रहा है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की नहीं, बल्कि कमजोर मानसून और तेजी से विकसित हो रहे सुपर अल नीनो की है, जिसका असर देश की आर्थिक गतिविधियों और शेयर बाजार दोनों पर पड़ सकता है।
वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत वर्ष 2026 के अपने उच्चतम स्तर 120 डॉलर प्रति बैरल से 40% से अधिक नीचे आ चुकी हैं। ऐसे में कई निवेशक तेल की कीमतों में गिरावट को शेयर बाजार में बड़ी तेजी का संकेत मान रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इस समय बाजार के लिए असली चुनौती घरेलू अर्थव्यवस्था से जुड़ी हुई है। उनका मानना है कि वैश्विक आपूर्ति से जुड़े जोखिम भले कम हुए हों, लेकिन घरेलू मांग पर संकट गहराने की आशंका बढ़ गई है।
‘निफ्टी’ का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं
इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो वर्षों से निफ्टी का प्रदर्शन लगभग सपाट बना हुआ है। अब बाजार पर असर डालने वाला प्रमुख कारक वैश्विक सप्लाई शॉक नहीं, बल्कि घरेलू खपत में संभावित गिरावट बनता जा रहा है। भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 56 प्रतिशत हिस्सा घरेलू खपत पर आधारित है और कमजोर मानसून इस हिस्से को सीधे प्रभावित कर सकता है।
देश के 72% हिस्से में वर्षा की कमी
मौसम संबंधी आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। 26 जून 2026 तक देश में हुई वर्षा दीर्घकालिक औसत (एलटीए) से 42 प्रतिशत कम दर्ज की गई, जो पिछले 10 वर्षों में मानसून की सबसे कमजोर शुरुआत मानी जा रही है। वर्षा की यह कमी देश के लगभग 72% हिस्से में दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि जून के दौरान बारिश में आई यह कमी वर्ष 2019 के अल नीनो के दौरान दर्ज 40% और वर्ष 2023 के 36% के मुकाबले भी अधिक है। इसका सीधा असर खरीफ फसल की बुवाई और उत्पादन पर पड़ने की आशंका है।
11 सालों का सबसे कमजोर मानसून
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने भी मानसून के अपने अनुमान को घटाकर दीर्घकालिक औसत का 90% कर दिया है। यह पिछले 11 वर्षों में मानसून का सबसे कमजोर पूर्वानुमान माना जा रहा है। खरीफ फसल देश के कुल अनाज उत्पादन का लगभग 50 प्रतिशत योगदान देती है, जबकि कृषि क्षेत्र में देश के 46 प्रतिशत कार्यबल को रोजगार मिलता है। ऐसे में कमजोर मानसून का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण आय, खपत, महंगाई और समूची अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई दे सकता है।
सुपर अल नीनो के कारण खपत पर दबाव
एमबिट कैपिटल का कहना है कि जनवरी की तुलना में भारत अब अपेक्षाकृत कम आर्थिक सुरक्षा के साथ मंदी की आशंका का सामना कर रहा है। संस्था के अनुसार, सुपर अल नीनो के कारण खपत पर दबाव बढ़ सकता है, जबकि निवेश, सरकारी खर्च और शुद्ध निर्यात पहले से ही चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इसके साथ ही महंगाई और चालू खाता घाटा बढ़ने की संभावना भारतीय रिजर्व बैंक के लिए भी मुश्किलें खड़ी कर सकती है, क्योंकि ऐसी स्थिति में आर्थिक विकास को गति देने के लिए नीतिगत समर्थन की गुंजाइश सीमित हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले सप्ताहों में मानसून की स्थिति, खरीफ फसल की प्रगति और ग्रामीण मांग से जुड़े संकेत भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे। फिलहाल निवेशकों की नजर वैश्विक घटनाक्रम से अधिक देश के मौसम और उससे जुड़ी आर्थिक परिस्थितियों पर टिकी हुई है।