वेदांता मामले में केंद्र को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, कहा- आप नाकाम रहे, भरोसा कैसे करेगा कोई, ऐसी कानूनी लड़ाई से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख घटेगी!
नई दिल्ली। विदेशी मध्यस्थता फैसलों को लागू करने में वर्षों तक अड़ंगा लगाने पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि सरकार का यही रवैया रहा तो कोई भी उस पर भरोसा नहीं करेगा। मध्यस्थता व्यवस्था को बढ़ावा देने की बात करने वाली सरकार खुद फैसलों को लागू करने का विरोध कर रही है। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की विश्वसनीयता प्रभावित होगी।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनमोहन की पीठ भारत सरकार की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें वेदांता लिमिटेड और रवा ऑयल (सिंगापुर) प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में आए 2004 और 2016 के मध्यस्थता फैसलों को लागू करने की अनुमति देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, पीठ ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि सम्मेलनों और सेमिनारों में मध्यस्थता व्यवस्था की खूबियां गिनाने से कुछ नहीं होगा, जब सरकार खुद फैसलों को लागू करने में बाधा खड़ी करेगी।
अंतरराष्ट्रीय भरोसा कमजोर
अदालत ने विवाद के असाधारण रूप से लंबे खिंचने पर भी नाराजगी जताई। पहला मध्यस्थता फैसला 2004 में आया था और अंतिम निर्णय 2016 में सुनाया गया, इसके बावजूद सरकार की ओर से कानूनी अड़चनें जारी रहीं। पीठ ने आगाह किया कि ऐसे मुकदमे देश की मध्यस्थता व्यवस्था पर अंतरराष्ट्रीय भरोसा कमजोर कर सकते हैं।
यह विवाद कृष्णा-गोदावरी बेसिन के रव्वा तेल क्षेत्र से जुड़ा है। वर्ष 1994 में केंद्र सरकार और कंपनियों के समूह के बीच तेल क्षेत्र के विकास के लिए उत्पादन हिस्सेदारी समझौता हुआ था। इसकी शर्तों की व्याख्या को लेकर विवाद पैदा हुआ तो मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर में मध्यस्थता की कार्यवाही शुरू हुई। अक्टूबर 2004 में न्यायाधिकरण ने आंशिक फैसला सुनाया, लेकिन देय राशि का निर्धारण बाकी रह गया। वर्ष 2011 में मलेशिया के संघीय न्यायालय ने इस फैसले को बरकरार रखा।
कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी
इसके बाद जुलाई 2014 में केंद्र सरकार ने कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर करीब 99 मिलियन डॉलर की वसूली का दावा किया। अक्टूबर 2016 में पुनर्गठित मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने अंतिम फैसला सुनाया। सरकार ने इसे लागू करने का विरोध करते हुए समय-सीमा, सार्वजनिक नीति और न्यायाधिकरण के अधिकार क्षेत्र समाप्त होने जैसे तर्क रखे।
हाईकोर्ट के फैसले में नहीं दिया दखल
– 1 जुलाई 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस जसमीत सिंह ने सरकार की सभी प्रमुख आपत्तियां खारिज कर दी थीं। अदालत ने माना कि फैसले को लागू कराने की याचिका निर्धारित समय-सीमा के भीतर है और बकाया राशि तय करने के मामले में न्यायाधिकरण का अधिकार क्षेत्र बना हुआ था। हाईकोर्ट ने बैंक गारंटी जारी करने का निर्देश भी दिया था।
– सुप्रीम कोर्ट ने कारण बताओ नोटिस जारी करने के बाद मध्यस्थ न्यायाधिकरण के पुनर्गठन से जुड़े हाईकोर्ट के निष्कर्षों पर भी विचार किया। हालांकि, उसे उच्च न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं मिला। केंद्र की अपील खारिज करते हुए पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले और आदेश में कोई त्रुटि नहीं है, कानून की गलती का तो सवाल ही नहीं उठता।
– केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी ने पैरवी की थी, जबकि दिल्ली हाईकोर्ट में वेदांता और रवा ऑयल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और अखिल सिब्बल पेश हुए थे।

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