Supreme Court का बड़ा फैसला : Rooh Afza ‘फ्रूट ड्रिंक’ है, अब लगेगा सिर्फ 4% Tax!

नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने हमदर्द (वक्फ) लैबोरेटरीज को बड़ी राहत देते हुए दशकों पुराने कानूनी विवाद पर विराम लगा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ‘Rooh Afza’ कोई सामान्य शरबत नहीं बल्कि एक ‘फ्रूट ड्रिंक’ है। इस फैसले के साथ ही अब इस पर 12.5% के बजाय केवल 4% वैट (VAT) देय होगा।

विवाद की जड़: शरबत बनाम फ्रूट ड्रिंक ​

यह पूरा कानूनी मामला उत्तर प्रदेश वैल्यू एडेड टैक्स एक्ट (UP VAT Act), 2008 की व्याख्या से जुड़ा था। असेसमेंट ईयर 2007-08 और 2008-09 के दौरान टैक्स विभाग और हमदर्द के बीच रूह अफ़ज़ा के वर्गीकरण को लेकर मतभेद पैदा हुआ।

​टैक्स विभाग का रुख : अधिकारियों का कहना था कि यह चीनी और कृत्रिम अर्क से बना एक सामान्य पेय है, इसलिए इस पर ‘अनक्लासिफाइड’ कैटेगरी के तहत 12.5% टैक्स लगना चाहिए।

– ​हमदर्द की दलील : कंपनी का तर्क था कि इसमें फलों का रस और प्राकृतिक तत्व शामिल हैं, जो इसे यूपी वैट एक्ट की अनुसूची-II के तहत ‘फ्रूट जूस/ड्रिंक’ की श्रेणी में रखते हैं, जिस पर केवल 4% टैक्स का प्रावधान है। ​

इलाहाबाद हाई कोर्ट और कमर्शियल टैक्स ट्रिब्यूनल ने पहले विभाग के पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह पलट दिया है।

अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

​जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने अपने फैसले में निम्नलिखित बिंदुओं को आधार बनाया: – ​कानूनी वर्गीकरण : कोर्ट ने माना कि रूह अफ़ज़ा को यूपी वैट अधिनियम की अनुसूची-II की प्रविष्टि 103 के तहत वर्गीकृत करना पूरी तरह सही है।

​व्यावहारिक दृष्टिकोण : पीठ ने कहा कि उत्पाद की प्रकृति और उसके निर्माण में इस्तेमाल सामग्री उसे फ्रूट ड्रिंक की श्रेणी में रखने के लिए पर्याप्त है।

​राज्यों में समानता : अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि देश के कई अन्य राज्यों में पहले से ही इसे रियायती टैक्स दरों पर बेचा जा रहा है, ऐसे में उत्तर प्रदेश में अलग मापदंड रखना उचित नहीं है।

‘रूह अफ़ज़ा को फ्रूट ड्रिंक की श्रेणी में रखना व्यावहारिक और वास्तविक है। हाई कोर्ट का इसे ‘नॉन-फ्रूट ड्रिंक’ मानना कानूनी रूप से सही नहीं था।’ – सुप्रीम कोर्ट

​एक दशक पुरानी लड़ाई का अंत

​हमदर्द लैबोरेटरीज के लिए यह जीत इसलिए भी बड़ी है क्योंकि कंपनी पिछले एक दशक से अधिक समय से इसे साबित करने में जुटी थी। निचली अदालतों ने इसे ‘आम बोलचाल में शरबत’ मानते हुए कंपनी की दलीलें खारिज कर दी थीं, लेकिन सर्वोच्च अदालत के इस फैसले ने तकनीकी और व्यावसायिक आधार पर हमदर्द के दावे पर अंतिम मुहर लगा दी है।

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