मासिक धर्म स्वच्छता पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, राज्यों से पूछा कि मौलिक अधिकार लागू क्यों नहीं हुआ?

मासिक धर्म स्वच्छता पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, राज्यों से पूछा कि मौलिक अधिकार लागू क्यों नहीं हुआ?

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई है कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) ने केंद्र सरकार को अब तक यह जानकारी नहीं दी है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मासिक धर्म स्वच्छता को मौलिक अधिकार का हिस्सा घोषित करने के फैसले को किस तरह लागू किया जा रहा है।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने कहा कि अगर फैसले में कही गई हमारी बातें सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहने वाली हैं, तो केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेश इस मौलिक अधिकार को कैसे लागू करेंगे? पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत ने मासिक धर्म की स्वच्छता और मासिक धर्म से जुड़े स्वास्थ्य को संविधान के अनुच्छेद 21 का हिस्सा घोषित किया है। यह अनुच्छेद व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा से संबंधित है। एक सितंबर को उसने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि वे अदालत की ओर से चिह्नित की गईं खामियों पर ध्यान दें। सुनवाई की अगली तारीख तक इस संबंध में रिपोर्ट पेश करें।

जीवन के अधिकार में मासिक धर्म अधिकार भी शामिल
शीर्ष अदालत ने 30 जनवरी को दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में मासिक धर्म से जुड़े स्वास्थ्य का अधिकार भी शामिल है। मामले में 13 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने पीठ को बताया था कि भारत सरकार ने इस मुद्दे को बेहद गंभीरता से लिया है।

अब तक केंद्र सरकार को कोई जवाब नहीं दिया गया
सभी राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों से यह बताने को कहा है कि अदालत के फैसले को किस तरह लागू किया जा रहा है। दुर्भाग्य से, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अब तक केंद्र सरकार को कोई जवाब नहीं दिया है। हमें यह समझ नहीं आता कि जब केंद्र सरकार जरूरी जानकारी मांगती है, तो राज्य और केंद्र शासित प्रदेश जवाब क्यों नहीं देते। हमें विश्वास है कि केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हमारे उस फैसले के महत्व को समझ चुके होंगे, जिसमें मासिक धर्म की स्वच्छता को मौलिक अधिकार का हिस्सा घोषित किया गया है।

इन समस्याओं से पढ़ाई छोड़ने की घटनाएं
पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत का यह फैसला उन लड़कियों के हित में है, जो मासिक धर्म की स्वच्छता से जुड़ी समस्याओं के कारण अपनी पढ़ाई छोड़ देती हैं। कोर्ट के अनुसार, यह समस्या खास तौर पर देश के दूरदराज के इलाकों में देखने को मिलती है। हम केंद्र सरकार को निर्देश देते हैं कि वह प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के साथ इस मुद्दे को बेहद गंभीरता से उठाए और लिखित रूप में यह जानकारी मांगे कि इस अदालत के फैसले को लागू करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 14 नवंबर को होगी।

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