मुंबई। लोकप्रिय अभिनेता Ranveer Singh एक विवादित बयान को लेकर कानूनी उलझन में फंस गए हैं। कन्नड़ फिल्म कांतारा के एक दृश्य की नकल करते समय धार्मिक संदर्भ पर की गई टिप्पणी को लेकर उनके खिलाफ मामला दर्ज हुआ है। इस पर सुनवाई करते हुए कर्नाटक High Court ने कड़े शब्दों में कहा कि प्रसिद्धि किसी को भी गैर-जिम्मेदाराना बयान देने की छूट नहीं देती। विवाद कैसे शुरू हुआ?

मामला उस वक्त तूल पकड़ गया जब एक सार्वजनिक कार्यक्रम में Ranveer Singh ने फिल्म ‘कांतारा’ के ‘दैव’ पूजा से जुड़े दृश्य की प्रस्तुति की। आरोप है कि प्रस्तुति के दौरान उन्होंने लोक-देवता के संदर्भ में ‘भूत’ शब्द का इस्तेमाल किया। कुछ संगठनों और व्यक्तियों ने इसे आस्था का अपमान बताते हुए आपत्ति दर्ज कराई और पुलिस में शिकायत दी। इसके बाद धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप में एफआईआर दर्ज की गई।
अदालत की टिप्पणी
लोकप्रियता के साथ जिम्मेदारी भी FIR रद्द कराने की मांग लेकर अभिनेता हाई कोर्ट पहुंचे। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय लोगों के शब्दों का व्यापक असर होता है। न्यायालय ने कहा कि किसी भी धार्मिक परंपरा या पूज्य प्रतीक पर बोलते समय सावधानी अपेक्षित है।
बेंच ने यह भी रेखांकित किया कि माफी मांग लेना पर्याप्त नहीं होता, क्योंकि डिजिटल युग में कही गई बात लंबे समय तक सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनी रहती है। अदालत ने संकेत दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा है।
बचाव पक्ष की दलील
रणवीर सिंह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि अभिनेता का उद्देश्य फिल्म की सराहना करना था, न कि किसी की भावना को ठेस पहुंचाना। उन्होंने स्वीकार किया कि शब्दों का चयन उचित नहीं था, लेकिन इसे आपराधिक कृत्य की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि बयान आवेग में दिया गया था और उसमें दुर्भावना का तत्व नहीं था।
जांच में सहयोग का निर्देश
अदालत ने तत्काल राहत देते हुए गिरफ्तारी जैसी कठोर कार्रवाई पर अंतरिम सुरक्षा प्रदान की, लेकिन साथ ही स्पष्ट किया कि अभिनेता को जांच एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग करना होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी राज्य की सांस्कृतिक परंपराओं और धार्मिक भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता आवश्यक है।
यह प्रकरण एक बार फिर इस बहस को सामने लाता है कि सार्वजनिक हस्तियों के वक्तव्यों की सीमा क्या होनी चाहिए और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे साधा।
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