इंदौर। बदमाशों के हाथ-पैर में पट्टियां बांधकर जुलूस निकालने के मामले में इंदौर पुलिस की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है। तीन बदमाशों के जुलूस के बाद सामने आए वीडियो ने यह संदेह पैदा कर दिया है कि क्या फर्जी पट्टियां बांधने का यह तरीका पहली बार अपनाया गया या पहले भी ऐसा होता रहा है। हाल के वर्षों में पुलिसकर्मियों पर बदमाशों से सांठगांठ और सौदेबाजी के आरोप भी लगते रहे हैं, इसलिए एसीपी स्तर की जांच पर सभी की नजरें हैं। सोमवार को संबंधित थाने के टीआई से एक घंटे पूछताछ भी की गई।
पिछले कुछ महीनों से पुलिस गिरफ्तार बदमाशों के जुलूस निकाल रही है। इन जुलूसों में आरोपी हाथ-पैर में पट्टियां बांधे और लंगड़ाते नजर आते हैं। पुलिस का कहना रहता है कि गिरफ्तारी के दौरान भागने की कोशिश में वे घायल हुए। लेकिन हाल में सामने आए एक वीडियो ने इस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि पट्टियां केवल दिखावे के लिए बांधी गई थी और इसके लिए रिश्वत लेने की भी चर्चा है।
यहां का है ये मामला
मामला हीरानगर थाना क्षेत्र का है। 23 जुलाई को कार और बाइक की टक्कर के बाद हुए विवाद में पुलिस ने शोभित साक्यवार, निक्की अहिरवार, ओम उर्फ देवाय और एक अन्य आरोपी के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया। रविवार को तीन आरोपियों का जुलूस निकाला गया, जिसमें उनके हाथ-पैर पर पट्टियां बंधी थीं। मामला तब पलट गया, जब अदालत से जेल भेजे जाने के बाद सामने आए वीडियो में वही आरोपी बिना पट्टियों के सामान्य हालत में दिखाई दिए। जिन पट्टियों के आधार पर दिन में उन्हें घायल बताया गया था, वे जेल के बाहर दीवार के पास पड़ी मिलीं। इसके बाद पुलिस की पूरी कार्रवाई संदेह के घेरे में आ गई।
घायल थे तो पट्टियां क्यों हटी
अब सवाल उठ रहे हैं कि यदि आरोपी सचमुच घायल थे तो पट्टियां तुरंत क्यों हटा दी गई, और यदि घायल नहीं थे तो उन्हें बांधा क्यों गया। आरोप यह भी हैं कि कुछ पुलिसकर्मियों ने केवल औपचारिकता निभाने और जुलूस को प्रभावशाली दिखाने के लिए रिश्वत लेकर पट्टियां बांधीं। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। एसीपी रुबीना मिजवानी ने वायरल वीडियो की जांच के आदेश दिए हैं और कहा है कि रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी।
पहला मामला या पहले हुआ
यह मामला केवल तीन आरोपियों तक सीमित नहीं है। पिछले कई महीनों में निकाले गए अनेक जुलूसों में भी बदमाश पट्टियां बांधे नजर आए हैं। ऐसे में अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या पहले भी इसी तरह दिखावे के लिए पट्टियां बांधी जाती थीं। यदि जांच में ऐसा सामने आता है तो पूरी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होंगे। इंदौर पुलिस पहले भी हिरासत में मारपीट, थानों में लेन-देन और रिश्वतखोरी जैसे आरोपों को लेकर विवादों में रही है। ऐसे में यदि फर्जी पट्टियों और रिश्वत के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल कुछ पुलिसकर्मियों की जिम्मेदारी का मामला नहीं रहेगा, बल्कि पुलिस की विश्वसनीयता पर भी बड़ा आघात माना जाएगा। अब यह जांच ही तय करेगी कि यह एक अलग घटना थी या लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था का हिस्सा।