ग्वालियर। प्रतिष्ठित सिंधिया राजपरिवार में पीढ़ियों से चला आ रहा अरबों रुपये की विरासत का कानूनी संघर्ष अब अंतिम मुकाम पर पहुंचता नजर आ रहा है। देश के सबसे अमीर और चर्चित राजघरानों में से एक इस परिवार के भीतर लंबे समय से चल रही अदालती लड़ाई आपसी सहमति से खत्म होने की उम्मीद बढ़ गई है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, पूर्व मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया और नेपाल में रह रहीं ऊषा राजे राणा के बीच संपत्तियों के बंटवारे को लेकर कई दौर की वार्ताएं हो चुकी हैं, जिसमें एक व्यावहारिक हल तलाश लिया गया है। इस दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए ग्वालियर जिला अदालत में समझौते से जुड़ा आवेदन भी दायर किया जा चुका है। यदि इस समझौते को कानूनी रूप से अंतिम मंजूरी मिल जाती है, तो देश की विभिन्न अदालतों में विचाराधीन 12 से ज्यादा मुकदमों का हमेशा के लिए अंत हो जाएगा।
‘जो जहां काबिज, वही मालिक’ के सिद्धांत पर बनी सहमति
पारिवारिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस विशाल संपत्ति के बंटवारे के लिए एक बेहद सरल और व्यावहारिक तरीका निकाला गया है। चर्चा है कि जो भी पारिवारिक सदस्य वर्तमान में जिस महल, भवन या जमीन पर काबिज है या जिसका वहां नियंत्रण है, वह संपत्ति कानूनी तौर पर उसी के पास रहेगी। हालांकि, इस फॉर्मूले की अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन कानूनी जानकारों का मानना है कि इतने बड़े और जटिल विवाद को सुलझाने का यह सबसे बेहतर रास्ता है।
इस समझौते से ग्वालियर के ऐतिहासिक जय विलास पैलेस की स्थिति भी पूरी तरह साफ होने की उम्मीद है। वर्तमान में इस पैलेस का एक हिस्सा म्यूजियम के तौर पर आम जनता के लिए खुला है, जबकि रानी महल वाले हिस्से में ज्योतिरादित्य सिंधिया का परिवार रहता है। वहीं, यशोधरा राजे सिंधिया भी ग्वालियर प्रवास के दौरान इसी परिसर में रुकती आई हैं।
कई महानगरों की अदालतों में उलझा है विरासत का मामला
सिंधिया परिवार की यह अकूत संपत्ति किसी एक शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई बड़े महानगरों में फैली हुई है। यही वजह है कि इसे लेकर ग्वालियर के अलावा देश की राजधानी दिल्ली, मुंबई और पुणे की अदालतों में सालों से मुकदमे चल रहे हैं। इनमें से सबसे ज्यादा मामले मुंबई की अदालतों में लंबित हैं।
इस विवाद के दायरे में ग्वालियर का जय विलास पैलेस, ऊषा किरण पैलेस, छोटी विश्रांति और हिरण्यवन कोठी जैसी आलीशान इमारतें शामिल हैं। इसके अलावा पुणे का पद्मा विलास पैलेस, मुंबई के पॉश इलाके में स्थित समुद्र महल फ्लैट्स, दिल्ली का लेखा विहार व सिंधिया विला और उज्जैन का ऐतिहासिक कालियादेह पैलेस भी इस कानूनी जंग का हिस्सा रहे हैं। यह विवाद सिर्फ अचल संपत्ति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सर जयाजीराव ट्रस्ट, कृष्ण माधव ट्रस्ट और सिंधिया इन्वेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड जैसी कंपनियों के मालिकाना हक से भी जुड़ा हुआ है।
राजमाता के पन्ना शिवलिंग की वापसी और 8 जुलाई की तारीख
इस पूरे घटनाक्रम के बीच राजपरिवार की धार्मिक आस्था से जुड़ी एक बेहद बेशकीमती धरोहर भी चर्चा के केंद्र में आ गई है। यह राजमाता विजयाराजे सिंधिया का वह खास शिवलिंग है, जो शुद्ध पन्ना रत्न से बना हुआ है और जिसकी वे नियमित आराधना करती थीं। वर्तमान में यह पवित्र शिवलिंग वसुंधरा राजे के पास सुरक्षित है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि नए समझौते के तहत यह ऐतिहासिक धरोहर अब ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंपी जा सकती है।
इस संभावित समझौते में ज्योतिरादित्य सिंधिया, वसुंधरा राजे, यशोधरा राजे और ऊषा राजे राणा के साथ-साथ परिवार के अन्य सदस्य जैसे चित्रांगदा राजे, कनिका देवी और प्रतिमा देवी भी शामिल हैं। सरकारी अभियोजक के मुताबिक, कोर्ट में समझौते की अर्जी दी जा चुकी है और अब सारी नजरें 8 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हुई हैं, जहां इस ऐतिहासिक पारिवारिक समझौते पर अदालत की मुहर लग सकती है।