14 दोषियों को उम्रकैद सुनाने वाली महिला जज को सोशल मीडिया पर धमकी, हाईकोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान, सरकार से जवाब मांगा !

नर्मदापुरम/भोपाल। नर्मदापुरम जिले के बहुचर्चित मॉब लिंचिंग मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाने वाली अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे) तबस्सुम खान को सोशल मीडिया के माध्यम से डराने-धमकाने का एक बेहद गंभीर मामला सामने आया। इस न्यायिक अधिकारी के खिलाफ इंटरनेट पर की जा रही आपत्तिजनक टिप्पणियों, डरावने संदेशों और भड़काऊ वीडियोज के वायरल होने के बाद अब यह पूरा प्रकरण एक बड़ा संवैधानिक और कानूनी मुद्दा बन चुका है। पूरे देश का ध्यान इस ओर खिंचने के बाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने इस पर स्वत: संज्ञान लिया है। अदालत ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को आगामी तीन दिनों के भीतर इस संबंध में एक विस्तृत शपथ पत्र (हलफनामा) कोर्ट के समक्ष पेश करने का हुक्म दिया है। इस बीच, सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) ने भी जजों को डराने की इस हरकत की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए न्यायपालिका की आजादी अक्षुण्ण रखने की मांग उठाई है।

12 जून के फैसले के बाद भड़का सोशल मीडिया पर विवाद
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत पिछले महीने हुई थी, जब एडीजे तबस्सुम खान ने 12 जून को नर्मदापुरम के चर्चित मॉब लिंचिंग कांड में 14 आरोपियों को कसूरवार पाते हुए उन्हें उम्रकैद की सजा मुकर्रर की थी। इस अदालती आदेश के फौरन बाद सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर न्यायालय और न्यायाधीश के विरोध में आपत्तिजनक पोस्ट्स की बाढ़ आ गई। इन संदेशों में फैसले को लेकर बेहद आक्रामक और जहरीली भाषा का इस्तेमाल किया गया। हद तो तब हो गई जब कुछ वीडियोज में न्यायाधीश को उनके मजहब के आधार पर निशाना बनाते हुए सीधे तौर पर धमकियां दी जाने लगीं, जिससे प्रदेश की कानून-व्यवस्था और न्यायिक स्वतंत्रता पर गहरे सवाल खड़े हो गए।

वायरल वीडियो ने बढ़ाई प्रशासन की मुश्किलें
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर वायरल एक वीडियो ने इस विवाद को और हवा दी। इस वीडियो में एक युवक साफ तौर पर यह कहता सुनाई दे रहा है कि यदि उसके 14 भाइयों को 10 दिनों के भीतर जेल से रिहा नहीं किया गया, तो पूरे सूबे और मुल्क में कत्लेआम मचा दिया जाएगा। वीडियो में महिला जज को लेकर मजहबी तौर पर बेहद अभद्र और भड़काऊ बातें कही गई थीं। इस वीडियो के सामने आते ही पुलिस प्रशासन तुरंत चौकन्ना हो गया। आला अफसरों ने इसे महज एक शख्स की बयानबाजी न मानकर पूरी न्यायिक प्रणाली और समाज के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने की एक सोची-समझी साजिश के रूप में देखा।

फैसले से असहमति का रास्ता धमकी कतई नहीं
हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ के जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की अदालत ने इस मामले पर विचार करते हुए बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। खंडपीठ ने दो टूक शब्दों में कहा कि किसी भी न्यायिक अधिकारी को सिर्फ इसलिए डराया-धमकाया नहीं जा सकता क्योंकि उसका फैसला समाज के किसी एक तबके या पक्ष को रास नहीं आया। माननीय न्यायाधीशों ने कहा कि अगर किसी को भी अदालत के फैसले से कोई शिकायत या आपत्ति है, तो उसके लिए देश में अपीलीय अदालत का कानूनी रास्ता हमेशा खुला हुआ है। सोशल मीडिया के जरिए जजों के खिलाफ माहौल बनाना, उन्हें बदनाम करना या डराना असल में न्यायिक प्रक्रिया को दबाने की एक नाकाम कोशिश है, जिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इसी के साथ हाईकोर्ट ने शासन से अब तक की गई पुलिसिया कार्रवाई और जज की सुरक्षा के इंतजामों पर तीन दिन में रिपोर्ट तलब की है।

सर्वोच्च न्यायालय के वकीलों के संगठन ने जताई गहरी चिंता
देश के लगभग 3000 एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड की नुमाइंदगी करने वाले संगठन सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) ने भी मध्य प्रदेश की इस घटना पर गहरा क्षोभ प्रकट किया है। संगठन की ओर से जारी बयान में कहा गया कि न्यायपालिका हमारे लोकतंत्र का सबसे मजबूत खंभा है और किसी भी अदालती आदेश को चुनौती देने का एकमात्र जरिया ऊपरी अदालत में अपील दायर करना ही है। इंटरनेट पर जजों के खिलाफ अभियान चलाना या उन्हें डराना सीधे तौर पर न्यायपालिका की संप्रभुता पर हमला है। एसोसिएशन ने इस मामले के दोषियों के खिलाफ सबसे सख्त दंडात्मक कार्रवाई की मांग की है, ताकि भविष्य में कोई भी न्यायिक अधिकारियों पर इस तरह का दबाव बनाने का दुस्साहस न कर सके।

पुलिस ने खुद दर्ज की शिकायत, 150 अकाउंट्स पर नजर इस मामले में सिवनी मालवा पुलिस ने जज की तरफ से किसी औपचारिक शिकायत का इंतजार किए बिना ही अपनी तरफ से कदम उठाते हुए 22 जून को दो अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है। थाना प्रभारी सुधाकर बारस्कर के मुताबिक, इंटरनेट पर फैलाए जा रहे वीडियो और भड़काऊ सामग्री की बारीकी से पड़ताल की जा रही है और इसे साझा करने वालों की शिनाख्त कर उन्हें कानून के शिकंजे में लाया जाएगा। जिले के पुलिस अधीक्षक साईं कृष्णा एस थोटा ने बताया कि सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने और न्यायपालिका को डराने वाली हर हरकत पर पैनी नजर रखी जा रही है। पुलिस ने अब तक ऐसे लगभग 150 सोशल मीडिया अकाउंट्स को चिन्हित किया है और कई आपत्तिजनक लिंक्स को इंटरनेट से हटवाया भी गया है। संबंधित कंपनियों से इन अकाउंट्स के मालिकों का ब्यौरा मांगा गया है। इसके अलावा, सिवनी मालवा पहुंचकर माहौल खराब करने की कोशिश करने वाले बाहरी तत्वों का भी पता लगाया जा रहा है।

महिला जज के घर और कोर्ट की सुरक्षा हुई चाक-चौबंद
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जिला प्रशासन ने एडीजे तबस्सुम खान की सुरक्षा व्यवस्था को बेहद कड़ा कर दिया है। पुलिस अधीक्षक के अनुसार, न्यायाधीश की हिफाजत के लिए 6 विशेष पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है, जो चौबीसों घंटे उनके सरकारी आवास और अदालत परिसर में मुस्तैद रहेंगे। इसके साथ ही उन्हें एक पर्सनल कम्युनिकेशन ऑफिसर (पीसीओ) भी दिया गया है, ताकि किसी भी विपरीत परिस्थिति में वे तुरंत पुलिस महकमे से संपर्क साध सकें। इलाके के एसडीओपी, थाना प्रभारी और खुद पुलिस अधीक्षक लगातार महिला न्यायाधीश के संपर्क में बने हुए हैं और पल-पल की सुरक्षा व्यवस्था की खुद समीक्षा कर रहे हैं। इस पूरे मामले पर हाईकोर्ट में अगली सुनवाई 9 जुलाई को होनी तय हुई है, जिसमें सरकार को अपनी पूरी कार्रवाई का लेखा-जोखा कोर्ट के सामने रखना होगा।

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