बेटे और बेटी की शिक्षा में भेदभाव स्वीकार नहीं, उच्च न्यायालय ने बढ़ाई भरण-पोषण राशि!

बेटे और बेटी की शिक्षा में भेदभाव स्वीकार नहीं, उच्च न्यायालय ने बढ़ाई भरण-पोषण राशि!

इंदौर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि पिता बेटे और बेटी की शिक्षा पर होने वाले खर्च में भेदभाव नहीं कर सकता। न्यायालय ने कहा कि यदि पिता अपने बालिग बेटे की तकनीकी शिक्षा पर पर्याप्त खर्च कर रहा है, तो वह नाबालिग बेटी की पढ़ाई और भरण-पोषण की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।
न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह की एकलपीठ ने यह आदेश पत्नी और नाबालिग बेटी द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में परिवार न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें पत्नी को 5000 रुपये और नाबालिग बेटी को 2000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

वर्ष 2001 में हुआ था विवाह
मामले के अनुसार पति-पत्नी का विवाह दिसंबर 2001 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। उनके दो बच्चे हैं, जिनमें बड़ा बेटा अब बालिग हो चुका है, जबकि नाबालिग बेटी अपनी मां के साथ रहती है। पत्नी और बेटी ने वर्ष 2024 में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत आवेदन प्रस्तुत कर पति पर प्रताड़ना और आर्थिक उपेक्षा के आरोप लगाए थे। उनका कहना था कि पति की मासिक आय लगभग 80000 रुपये है तथा अचल संपत्तियों से उसे प्रतिवर्ष लगभग 1500000 रुपये की अतिरिक्त आय भी प्राप्त होती है।

पढ़ाई और पत्नी के उपचार का दिया गया तर्क
प्रतिवादी पक्ष ने न्यायालय में कहा कि वह अपने बड़े बेटे की तकनीकी शिक्षा का खर्च वहन कर रहा है। साथ ही पत्नी के हृदय रोग के उपचार पर भी राशि खर्च कर रहा है। यह भी बताया गया कि वह अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी निभा रहा है। परिवार न्यायालय ने इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए पत्नी और बेटी के पक्ष में भरण-पोषण राशि निर्धारित की थी, लेकिन उनकी मांग से कम राशि स्वीकृत की थी।

बेटी की पढ़ाई को नहीं किया जा सकता नजरअंदाज
उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान पाया कि नाबालिग बेटी 9वीं कक्षा में अध्ययनरत है। स्कूल शुल्क के अतिरिक्त पिता उसकी शिक्षा और अन्य आवश्यकताओं के लिए कोई अलग राशि नहीं दे रहा था। न्यायालय ने कहा कि विद्यालय में पढ़ रहे बच्चों की आवश्यकताओं को माता-पिता की इच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता। यदि पिता अपनी इच्छा से बेटे की पढ़ाई का खर्च उठा रहा है, तो वह पत्नी और बेटी के भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी कम नहीं कर सकता। पीठ ने यह भी माना कि परिवार न्यायालय ने यह तथ्य पर्याप्त रूप से नहीं देखा कि प्रतिवादी के पिता के पास कृषि भूमि से आय का स्रोत है और उन्हें पेंशन भी प्राप्त होती है।

सम्मानजनक जीवन भी भरण-पोषण का हिस्सा
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि बेटे और बेटी की शिक्षा के खर्च में भेदभाव की अनुमति नहीं दी जा सकती। नाबालिग बेटी को समान अवसर और उचित सहयोग मिलना चाहिए। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का अर्थ केवल भोजन और आवश्यक खर्च नहीं, बल्कि सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार भी है।
इन्हीं आधारों पर उच्च न्यायालय ने परिवार न्यायालय के आदेश में संशोधन करते हुए पत्नी के लिए भरण-पोषण राशि 5000 रुपये से बढ़ाकर 7500 रुपये प्रतिमाह तथा नाबालिग बेटी के लिए 2000 रुपये से बढ़ाकर 10000 रुपये प्रतिमाह निर्धारित कर दी।

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